अपने उसूल थे बस बहुत प्यार मुझे,
क्या हुआ जो वक़्त-वक़्त पर पड़े तोड़ने मुझे
उसूल ही तो थे, मेरे जज़्बातो से भरे हुए।
और जज्बातों की ,
इस प्रैक्टिकल दुनिया में क्यूँ करनी फिक्र तुझे।
एक बेटी की जज्बात, पूरे विश्वास के साथ।
एक नई डोर में बंधने को तैयार।
कौन है? क्या है? कैसा है?
सवालों से भरे जज्बातों को दबाकर,
नइ ज़िंदगी के स्वागत को तैयार।
उसने भी क्या खूब स्वागत किया।
एक बेटी को बहु बनाकर,
उसकी हर खुशी को, जिम्मेदारियों के तले दबाकर।
यहाँ भी बस फर्ज़, प्रथम हो गए,
उसूलों की क्या बात कीजिये, टूटने थे टूट गए!
उसूल ही तो थे, मेरे जज्बातों से भरे हुए।
पति, सास-ससुर, ननद और देवर!
सबकी ख़ुशी के मायने अपने,
तुम बहु हो बस फ़र्ज़ निभाओ,
और करना ही है क्या? तुझे कोई दूसरा काम।
उसूल बनते ही टूटने के लिए है,सो टूट गए।
उसूल ही तो थे, मेरे जज्बातों से भरे हुए।