जाने क्या कहानी है समंदर की भी।
कभी जिसकी रवानी, बनाती सभी को दीवानी।
उछल-उछल, बच्चे क्या! बड़ो को भी लुभाती।
छेड़ तरंगे, लहरों की खूब अठखेलियाँ मचाती।
तो कभी गुस्से में लाती सुनामी।
और साहिर क्या शहर को भी डुबाती।
जाने क्या कहानी है! समंदर की भी।
कभी थोड़ा-थोड़ा कर, कर भावो को समग्र,
खिंच चाँदनी को पास बुलाती,
कह रही हो जैसे, आ अभी! नही तो,
मैं हो रही तूफानी।
अपनी ही धुन में नाचतीं-गाती।
जाने समंदर की भी क्या है कहानी।
कर दूर तिमिर को, चांदनी भी क्या छटा बिखराती।
छेड़ अपनी किरणों की तान को,
लहरों संग खूब रास रचाती।
कह रही हो जैसे कोई कहानी।
हर पूर्णमासी होती इसकी अदा निराली।
कर वादा फिर आने का चाँदनी लौट चली जाती।
महिनों की तृष्णा को कर शांत जैसे,
समन्दर फिर खुद सौम्य बन जाती।
कुछ तो होगी ही कहानी इसकी भी,
जो हर पूर्णमासी याद इसे आ जाती।
✍️ Upeksha 🍂