माँ के आँचल से जीवन के धुंधले प्रकाश तक | Mother's Day Special.


Aparichita

Thoughts • Stories • Inner Reflections

जहाँ शब्द आत्मा से मिलते हैं

बीत गया बचपन — आगे जाने क्या होगा?

एक बेटी के जीवन, समय, प्रेम, संघर्ष और आत्म-यात्रा की भावपूर्ण कविता



✨ भूमिका

जीवन का सबसे सुंदर अध्याय शायद बचपन ही होता है।
जहाँ मिट्टी भी चन्दन लगती है, आँचल ही संसार होता है, और माँ की गोद में हर भय समाप्त हो जाता है।

लेकिन समय रुकता नहीं…

धीरे-धीरे वही बच्ची जिम्मेदारियों, अपेक्षाओं, प्रेम, संघर्ष और आत्म-खोज के मार्ग पर चल पड़ती है।
आपकी यह कविता उसी यात्रा की गहराई को छूती है — बचपन से युवावस्था, फिर जीवन के आध्यात्मिक प्रश्नों तक।

यह केवल एक कविता नहीं, बल्कि हर स्त्री के मन की अनकही यात्रा है।

🌸 कविता

“बीत गया बचपन, आगे जाने क्या होगा…”

बीत गए दिन बचपन के,
बस याद रही निशानी…
जब माँ के आँगन खेली थी,
मिट्टी में सनी वो कहानी।

लरखराते छोटे कदम थे,
भोली सी मुस्कान थी,
धूल भी तब चन्दन लगती,
जब माँ की ममता साथ थी।

वो संसार प्रेम और वात्सल्य का,
फिर कहाँ नसीब होगा?
न बचपन वैसा लौटेगा,
न वैसा ही मौज होगा।

बचपन की गलियाँ पीछे छूटीं,
अब जवानी द्वार खड़ी है,
कली खिलकर कमल बनी तो,
नई दिशाओं की घड़ी है।

मधुकर किसे बनाएगा मन?
कौन हृदय को समझेगा?
कौन वसंत बनकर आकर,
सूनेपन को भर देगा?

नए संसार की दहलीज़ पर,
अब इम्तिहानों की बारी है,
इस पार अथाह प्रयास खड़े,
उस पार धुंधली तैयारी है।

न जाने आगे क्या होगा…

कदम-कदम पर प्रश्न खड़े हैं,
विवेचनाएँ, परीक्षाएँ,
अब तक केवल फूलों को जाना,
बाकी हैं पतझर की छायाएँ।

अब तक बस बेटी कहलायी,
अब जिम्मेदारियों की बारी है,
श्रृंगार तेरा अधिकार सही,
पर तू केवल प्रीतम-प्यारी नहीं।

मत खो जाना दर्पण में ही,
मोहक अपनी छवि निहारते,
याद रख — सृष्टि स्वरूपा भी तू,
जीवन को अर्थ सँवारते।

हाँ, साथ कहीं शिव-सा कोई,
प्राणों का आधार बने,
पर उस पार धुंधले प्रकाश में,
क्या छिपा — कौन जाने…

हर पल नई चेतनाएँ जागें,
हर मोड़ नई चेतावनी,
जैसे तपती धूप में मिल जाए,
वटवृक्षों की शीतल छाँव घनी।

कभी संघर्षों का कोलाहल,
कभी परिणामों का गर्व,
कभी खुशी का उजला सावन,
कभी विषादों का पर्व।

पर क्या बस इतना ही जीवन?
क्या यही अंतिम सार है?
नहीं…
तू केवल धरती की वासी नहीं,
तेरा कोई और भी द्वार है।

एक नया ब्रह्मधाम पुकारे,
जो उस धुंधले प्रकाश के पार है…
जहाँ शायद शांति पूर्ण हो,
जहाँ आत्मा का विस्तार है।

इस पार प्रेम, प्रयास और रिश्तों का संगम,
उस पार शायद मौन का सागर होगा…

बीत गया बचपन…
आगे जाने क्या होगा?

🌿 कविता का भावार्थ

यह कविता एक स्त्री के सम्पूर्ण जीवन-चक्र को दर्शाती है।

  • बचपन की निष्कलुषता
  • युवावस्था की दहलीज़
  • प्रेम और रिश्तों की खोज
  • जिम्मेदारियों का भार
  • आत्म-चेतना
  • और अंततः आध्यात्मिक प्रश्न

कविता यह भी कहती है कि स्त्री केवल किसी की “प्रिय” नहीं होती — वह स्वयं सृष्टि की धुरी है।

💭 Ending Thoughts | अपरिचिता की कलम से

कभी-कभी जीवन एक धुंधले प्रकाश जैसा लगता है…
जहाँ हम चलते तो रहते हैं, पर मंज़िल स्पष्ट नहीं होती।

बचपन पीछे छूट जाता है,
जवानी जिम्मेदारियाँ ले आती है,
और फिर एक दिन आत्मा पूछती है —
“क्या बस इतना ही जीवन था?”

शायद जीवन का अर्थ केवल जी लेना नहीं,
बल्कि हर पड़ाव को समझना है।

About the Author

Shikha writes on Aparichita to explore life, emotions, spirituality, and quiet reflections of the soul. Her words often come from small moments of life — a silent evening, a sky full of stars, or a thought that refuses to stay unspoken.




Shikha Bhardwaj

Hi, I'm Shikha. I help English learners improve vocabulary, grammar, speaking confidence, and communication skills through practical lessons and real-life examples.

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