जिंदगी के कैसे कैसे अफसाने।
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जाने ज़िन्दगी के कैसे- कैसे अफ़साने!
कुछ हरे - हरे, सावन के जैसे,
तो फिर वसंत रूठे- रूठे से।
पूस की ठंड, गर्त भरी हो जैसे।
उसपर बहार वेदना के जैसे।
जाने जिंदगी के कैसे - कैसे अफ़साने!
कोयलों की तान पर भी लिखे,
जाने कितने फ़साने।
सब मनोरम, सब सुहाने।
लेकिन इस मृदु बोल के कोई भेद न जाने,
ख़ुद का घर बसाने को,
जाने कितने कौओ के घर उजाड़े।
इंसानों की भी देखी फितरत ऐसी,
कहाँ किसी की ख़ुशी जचती वैसी।
बस इसी ताक में रहते जैसे,
कैसे - किसी को गर्त पड़ोसे।
और अपनी महल सजा ले।
जिंदगी के जाने कैसे - कैसे अफ़साने।
✍️Shikha Bhardwaj❣️
