आज फिर मौसमो की अंगराई ने
बरसातों की झड़ी लगाई है,
बारिशों की बूंदे याद तेरी संग ले आई है।
कैसे यकीं दिलाऊँ ख़ुद को,
कि तू बस अब यादो की परछाईं है।
लाख कोशिशें कर लूं , ख़ुशी के गीत गाने की।
लेकिन लब्जो की लड़खड़ाहट,
दिलो की उदासी,
याद तेरी संग ले आई है।
और फिर वही मायूसी की धुन बजाई है।
मैं हार जाति हूँ, उदासी जीत जाती है।
तू नही आता, तेरी याद नैनो से छलक जाती है।
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