इश्क़ के बाद, खुद का ही वजूद ढूंढना पड़ता है...

 इश्क़ के बाद, खुद का ही वजूद ढूंढना पड़ता है...



 इश्क़ के बाद, खुद का ही वजूद ढूंढना पड़ता है...

ढूंढनी पड़ती है — अपनी ही हँसी, अपनी मुस्कान।

जीना पड़ता है... क्योंकि साँसें रुकती नहीं।

वो शख्स, जो मेरी ज़िंदगी था...

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Dhundhni padti hai apni hi hasi


वही, हाँ वही... मुझे "हम" से "मैं" कर गया।

दिल अब भी है, पर धड़कन वो ले गया।

अब वजूद क्या? इस सूने मकान का —

दीवारें तो हैं, पर घर... वो अपने साथ ले गया।

मेरा आशियाँ, एक खंडहर बना गया।


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