क्या आप जानते हैं "पितृ पक्ष" हिन्दू संस्कृति का अभिन्न अंग है ?

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कौओं के भोज से लेकर पुण्यात्माओं के पानी पिलाने के कर्मकांड तक।



क्या आप जानते हैं "पितृ पक्ष" हिन्दू संस्कृति का अभिन्न अंग है ?


"पितृ पक्ष" हिन्दू संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है, लेकिन हिन्दूओं का हर पर्व बुद्धिजीवियों के निशाने पर ही रहता है। तो आइए जानते हैं, "पितृ पक्ष" से जुड़े, प्रकीर्तिक रीजन और मान्यता।




 आजकल जहां देखे वहीं हिन्दू धर्म और सनातन संस्कृति और उनसे जुड़े आस्था को लेकर कोई न कोई कटाक्ष करते रहता है। पूरी बाते पता तो होती नही, लेकिन कटाक्ष करना जैसे एक फ़ैशन सा हो गया हो।

अभी श्राद्ध और तर्पण (पितृपक्ष_pitripaksh)जैसे पुण्यकर्म की तिथि भाद्र पद मास की शुक्ल पक्ष पूर्णिमा तिथि को आनेवाला है, लेकिन हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी आलोचकों की कमी नही होगी। बुद्धिजीवियों का तरह - तरह का बयान आना शुरू हो जाएगा।

जैसे: कौओं के भोज से लेकर पुण्यात्माओं के पानी पिलाने के कर्मकांड तक।

इसी से जुड़ी एक कहानी है, जो मैं आपलोगो के सामने प्रस्तुत करना चाहती हूँ जो कि"अधजल गगड़ी छलकत जाय" जैसे मुहावरों को भी सत्यता प्रदान करते हैं।

कहानी इस तरह से है:--


एक बार एक पंडितजी नदी में अपने पूर्वजों का तर्पण कर रहे थे।उधर से एक फ़क़ीर गुज़र रहा था, पंडित जी को तर्पण करते देख फकीर भी अपनी बाल्टी से पानी गिराकर जाप करने लगा कि..

"मेरी प्यासी गाय को पानी मिले।"


पंडितजी के पूछने पर उस फकीर ने थोड़ा उचकते हुए कहा कि... 


जब आपके द्वारा चढाये जल और भोग आपके पूर्वजों को मिल  जाते हैं तो मेरी गाय तो अभी इसी लोक में है, उसे भी पानी मिल जाएगा।


इस पर पंडितजी बहुत लज्जित हुए।"


इस तरह के मनगढंत कहानी सुनाकर एक मित्र जोर से ठहाका मारकर हँसने लगे और उस महफ़िल में धाक जमाने की कोशिश कर मुझसे कहने लगे कि - 

"सब पाखण्ड है जी..!"


हिंदुओं में इंसानियत और भाईचारा कूट-कूट कर भरा हुआ है, शायद इसिलए  हर कोई सहिष्णुता का कार्ड खेलकर इन्हें अब तक़ हर जगह हर बात के लिए कुछ ज्यादा ही सहिष्णु समझना भी एक रिवाज सा होता जा रहा है।


इसीलिए, लोग हमसे ऐसी बकवास करने से पहले ज्यादा कुछ सोचते नहीं है। वे क्यों नहीं समझते कि हमारी सहिष्णुता भी एकवक्त तक ही रहती है और हमारी संस्कृति पर सवाल उठाने वाले को हम मुँहतोड़ जबाब दे सकते हैं।


खैर...  मै सीधे-सीधे उससे कुछ कहना ठीक नहीं समझा और पास ही रखे AC के रिमोट से एक नम्बर डायल करने लगा 

और उसे, अपने कान से लगा लिया. 


रिमोट से तो बात हो नही सकती थी सो बात नही हुई ... 

फ़िर मै उस बुद्धिजीवी से शिकायत करने लगा।


मेरी बात सुनकर वे साहब गुस्से में भड़क गए।

और मुझे बोलने लगे- " ये क्या मज़ाक कर रहे हो? 'रिमोट' से भला बात कैसे होगी, मोबाइल का फंक्शन भला रिमोट में कैसे काम करेगा.?

फ़िर मेरी भी हँसी छूटने लगी...

हँसी और गुस्से का भी मिला - जुला स्वरूप था।

थोड़ी सी कुटिल मुस्कान के साथ मैने भी कहना सुरु किया...


वही तो मैं भी कह रहा हूँ कि तुम जो ये मनगढ़ंत कहानी सुनाकर महफ़िल में वाहवाही लूटने की कोशिश कर रहे हो, बिना सत्यता या ग्रंथो को जाने, जो स्थूल शरीर छोड़ चुके लोगों के लिए बनी व्यवस्था है, रीति रिवाज है, वो जीवित प्राणियों पर कैसे काम करेगी ?


इस पर मेरे बुद्धिजीवी दोस्त अपनी झेंप मिटाते हुए कहने लगे- 

"ये सब पाखण्ड ही तो है , अगर ये सच है... तो, इसकी पुष्टि करके दिखाइए"


इस पर मैने कहा.... ये सब छोड़िए

और, ये बताइए कि न्युक्लीअर पर न्युट्रान के बम्बारमेण्ट करने से क्या ऊर्जा निकलती है ?


वो बोले - " बिल्कुल ! इट्स कॉल्ड एटॉमिक एनर्जी।"


फिर, मैने उन्हें एक चॉक और पेपरवेट देकर कहा, अब आपके हाथ में बहुत सारे न्युक्लीयर्स भी हैं और न्युट्रांस भी...!


अब आप इसमें से एनर्जी निकाल के दिखाइए...!!


साहब समझ गए और तनिक लजा भी गए एवं बोले-

"जी , एक काम याद आ गया; बाद में बात करते हैं "


कहने का मतलब है कि..... यदि, हम किसी विषय या तथ्य को प्रत्यक्षतः सिद्ध नहीं कर सकते तो इसका अर्थ है कि हमारे पास समुचित ज्ञान, संसाधन वा अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं है ,


लेकिन इसका मतलब ये बिलकुल भी नहीं है कि  वह तथ्य और उन लोगो का वविश्वास, सब गलत है।


क्योंकि, सिद्धांत रूप से तो हवा में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन दोनों मौजूद है..

फिर , हवा में हाथ देने से ही पानी क्यों नहीं बना लेते ?


अब जब आप हवा से पानी नहीं बना रहे हैं, वहाँ से डाइरेक्ट पानी नही प्राप्त किया जा सकता है तो इसका मतलब ये तो कतई नही है कि हम घोषित कर दे या आलोचना करने बैठ जाए कि हवा में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन ही नहीं है।


हिंदुओं पर जैसे जैसे बाहरी आक्रांताओं की मार पड़ी है, वैसे वैसे हम अपने वेद और ग्रंथों से दूर होते गए और सनातन संस्कृति के किसी भी रिचुअल को गहराई से समझने की कोशिश जरूरी नहीं समझी। बस जो पूर्वज करते आए, वही, उसी तरह से पूर्वजों के द्वारा बताए नियमों को करते चले आए, लेक़िन फिर भी हम तक जी पहुंचा है, हम अगर उसे निष्ठा से करे तो, हमारे द्वारा श्रद्धा से किए गए सभी कर्म दान आदि भी आध्यात्मिक ऊर्जा के रूप में हमारे पितरों तक अवश्य पहुँचते हैं।


इसीलिए, व्यर्थ के कुतर्को और बहकावों मे फँसकर अपने धर्म संस्कार व संस्कृति के प्रति कुण्ठा न पालें, किसी के बेतुके प्रश्न से विचलित होकर, हमे हमारी श्रद्धा में संसय का बीज नही बोना है।

हिन्दू संस्कृति पर प्रहार सनातन पर्व हमेसा बुद्धिजीवियों के निशाने पर क्यों होता है?


जानिए इस साल कब से शुरू हो रहा है, पितृ पक्ष:

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार पितृ पक्ष का आरंभ हर साल भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि से होता है, और अश्विन मास की अमावस्या को समाप्त होता है। ये 16 दिन पितरों के नाम को समर्पित किया जाता हैं।

इस वर्ष पितृ पक्ष की तिथि का आरंभ 10 सिंतबर 2022 शनिवार से हो रहा है और 25 सितंबर 2022 को समापन होगा, जो कि हिन्दी तिथि के अनुसार अमावस्या का दिन होता है और 25 सिंतबर को अश्विन मास की अमावस्या तिथि है।

"श्राद्ध" की तिथियां "2022"


10 सितंबर 2022- पूर्णिमा श्राद्ध, भाद्रपद, शुक्ल पूर्णिमा
10 सितंबर 2022- प्रतिपदा श्राद्ध, अश्विना, कृष्ण प्रतिपदा
11 सितंबर 2022- अश्विना, कृष्णा द्वितीया
12 सितंबर 2022 - अश्विना, कृष्ण तृतीया
13 सितंबर 2022 - अश्विना, कृष्ण चतुर्थी
14 सितंबर 2022 - अश्विना, कृष्ण पंचमी
15 सितंबर 2022 - अश्विना, कृष्ण षष्ठी
16 सितंबर 2022 - अश्विना, कृष्ण सप्तमी
18 सितंबर 2022 - अश्विना, कृष्ण अष्टमी
19 सितंबर 2022 - अश्विना, कृष्ण नवमी
20 सितंबर 2022 - अश्विना, कृष्ण दशमी
21 सितंबर 2022 - अश्विना, कृष्ण एकादशी
22 सितंबर 2022 - अश्विना, कृष्ण द्वादशी
23 सितंबर 2022 - अश्विना, कृष्ण त्रयोदशी
24 सितंबर 2022 - अश्विना, कृष्ण चतुर्दशी
25 सितंबर 2022 - अश्विना, कृष्ण अमावस्या


पितृपक्ष 2022: क्यों और कैसे मनाए?


पुरानी परंपराओं के अनुसार:


हिंदू धर्म में पितृपक्ष(Pitar Paksh) का काफी ज्यादा महत्व है और ये सनातन चली आ रही प्रक्रिया है।कहते हैं कि इस दौरान किसी भी शख्स की ओर से की गई पितरों की पूजा और पिंडदान का काफी ज्यादा महत्व होता है। यही नहीं पितृपक्ष (Pitar Paksh)के बारे में तो यह भी कहा जाता है कि पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और साथ ही इस दौरान हमारे पूर्वज भी पिंडदान और तर्पण से खुश होकर अपने पुत्र-पौत्रों अर्थात नई पीढियों को आशीर्वाद देते हैं।

"पितृ पक्ष" में पितरों और पूर्वजों को याद किया जाता है ये एक सांस्कृतिक और उनके प्रति आभार व्यक्त करने का प्रक्रिया है। पूर्वजों और ब्राह्मणों से सुनते आए हैं कि "पितृ पक्ष" में विधि पूर्वक पितरों और परमात्मा को प्राप्त पूर्वजों का श्राद्ध करने से व्यक्ति के जीवन में आने वाली सभी परेशानियों को दूर किया जा सकता है।


पितरों के लिए किए गए तर्पण विधि से पितर तृप्त होकर अपने वंशजों, अगली पीढ़ी को आशीर्वाद देते हैं, जिससे जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती रहती है। हिन्दू धार्मिक मान्यता के अनुसार ऐसा माना गया है कि अगर पितरों या परलोक को प्राप्त पूर्वजों का श्राद्ध न किया जाए, तो उनको पूर्ण रूप से मुक्ति नहीं मिलती है और उनकी आत्मा तृप्त नही होती है। पितृ पक्ष में पितरों का श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है।


पितृपक्ष(Pitar Paksha) लोग अपने पूर्वजों के लिए श्राद्ध भी करते हैं, जिसमें वह ब्राह्मणों को भोजन के अलावा तर्पण ब्राह्मणों को भोजन के साथ - साथ अन्य जीवों, और पशु पक्षियों को भी भोजन कराते हैं। दरअसल लोग ऐसा इसलिए करते हैं, क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि हमारे पूर्वज इन्हीं पशु पक्षियों के जरिए ही अपना आहार ग्रहण करते हैं।


शास्त्रों में श्राद्ध के नियम दो तरह से दिए है- एक है, पिंडदान और दूसरा तरीका है ब्राह्मण भोजन।



 मान्यता है कि ब्राह्मण के मुख से देवता हव्य(हवनिय) को और पितर कव्य(पित्तरों को दिए जाने वाला अन्न) को खाते हैं। श्राद्ध करते समय घर पर आए ब्राह्मण के पैर धोने चाहिए। 

 


यही नहीं ऐसा कहा जाता है कि इन्ही पितृपक्ष( Pitar Paksh) के दौरान पशु पक्षियों के माध्यम से वो हमारे निकट आते हैं और इन्ही रिवाज़ो के द्वारा ही वह अपना आहार भी ग्रहण करते हैं।

 हालांकि क्या आपको ये पता है कि किन जीवों और पशु पक्षियों के जरिए हमारे पितृ अपना आहार ग्रहण करते हैं।

गाय, कौओं, पशु - पक्षी, यहां तक कि चींटी के जरिए भी मान्यता है कि हमारे पुर्वज अपना आहार ग्रहण करते हैं।


यही वजह है कि श्राद्ध के दौरान इनका भी एक अंश निकाला जाता है। ऐसा करने से ही श्राद्ध को पूरा माना जाता है। इसके अलावा श्राद्ध के दौरान पितरों को अर्पित करने वाले भोजन के पांच अंश निकाले जाते हैं, जो क्रमशः गाय, कुत्ते, चींटी, कौवे और देवताओं के लिए होते हैं, बिना ये अंश निकाले श्राद्ध पूर्ण नहीं होती है और इनका अर्पण करने को पंच बलि कहा जाता है।


और हाँ...


जहाँ तक रह गई वैज्ञानिकता की बात तो....


क्या आपने किसी भी दिन पीपल और बरगद के पौधे लगाए हैं...या, किसी को लगाते हुए देखा है?

क्या फिर पीपल या बरगद के बीज मिलते हैं ?

इसका जवाब है नहीं....


ऐसा इसीलिए है क्योंकि... बरगद या पीपल की कलम जितनी चाहे उतनी रोपने की कोशिश करो परंतु वह नहीं लगेगी.


इसका कारण यह है कि प्रकृति ने यह दोनों उपयोगी वृक्षों को लगाने के लिए अलग ही व्यवस्था कर रखी है.


जब कौए इन दोनों वृक्षों के फल को खाते हैं तो उनके पेट में ही बीज की प्रोसेसिंग होती है और तब जाकर बीज उगने लायक होते हैं.


उसके पश्चात कौवे जहां-जहां बीट करते हैं, वहां वहां पर यह दोनों वृक्ष उगते हैं.


और... किसी को भी बताने की आवश्यकता नहीं है कि पीपल जगत का एकमात्र ऐसा वृक्ष है जो round-the-clock ऑक्सीजन (O2) देता है और वहीं बरगद के औषधि गुण अपरम्पार है.


साथ ही आप में से बहुत लोगों को यह मालूम ही होगा कि मादा कौआ भादो महीने में अंडा देती है और नवजात बच्चा पैदा होता है.


तो, इस नयी पीढ़ी के उपयोगी पक्षी को पौष्टिक और भरपूर आहार मिलना जरूरी है...


शायद, इसलिए ऋषि मुनियों ने कौवों के नवजात बच्चों के लिए हर छत पर श्राघ्द के रूप मे पौष्टिक आहार की व्यवस्था कर दी होगी.


जिससे कि कौवों की नई जनरेशन का पालन पोषण हो जाये......

और हमारी संस्कृति हमे सिखाती भी है कि खुद के भोजन से पहले गाय, पशु - पक्षी, चींटी सबके लिए कुछ न कुछ उनके हिस्से का निकाल कर ही भोजन ग्रहण करना चाहिए।

हिन्दू संस्कृति से जुड़े, चाहे जो भी रिवाज़ है, उसमे कहीं न कही वैज्ञानिकता भी छुपी है और प्रकृति का भी रक्षा करना सिखाया गया है।

ठीक है कि आप उस रिवाज को नही समझ पा रहे हैं, तो यदि व्यवस्था है तो समझने की चेष्टा कीजिए या फिर नही तो प्रकृति कल्याण हेतु ही उन रिवाज़ो को श्रद्धापूर्वक कर लीजिए।

आप करेंगे प्रकृति के लिए, और प्रकृति कहीं न कही उसको फिर आप तक ही वापस करेंगी वो भी वरदान के रूप में जिससे आपका और आपके समाज का कल्याण ही हो।



इसीलिए....  श्राद्ध का तर्पण करना न सिर्फ हमारी आस्था का विषय है बल्कि यह प्रकृति के रक्षण के लिए भी नितांत आवश्यक है।

पश्चिमी सभ्यताओं के चपेट में आकर हम अपनी संस्कृति भुलते जा रहे है और अपने ही समाज को बड़ी ही बेतरतीब से बर्बाद होने के कगार पर ले आए हैं।


हम-आप पीपल के पेड़ को देखे और संतुष्ट होकर अपने पूर्वज को याद करे कि उन्होंने श्राद्ध दिया था इसीलिए यह दोनों उपयोगी पेड़ हम देख रहे हैं.

वरना नई पीढ़ी ने तो जंगल तक नष्ट कर दिए और आर्टिफिशियल ऑक्सीजन के ऊपर निर्भर हो गए।


हमेसा याद रखे कि... सनातन धर्म और उसकी परंपराओं पे उंगली उठाने वालों से इतना ही कहना है..


आदिकाल से ही हमारे ऋषि मुनियों को सब मालूम था कि धरती गोल है और हमारे सौरमंडल में 9 ग्रह हैं, जिसे वैज्ञानिकों ने कितने दसक के बाद उसे ढूंढा और अपने नाम का लेवल चढ़ा दिया।

हम भी हमारी कुछ उच्च महत्वाकांछा, कुछ सरकार की नीतियों के आगे लाचार होते गए, लेकिन अब बहुत देर हो चुकि है और हमे अपने धर्म के प्रति आस्था को पुरज़ोर तरीके से जगाना होगा।


हमारे ऋषि मुनि तो बिना कुछ आधुनिकता के उनको हर बात का ज्ञान था या यूं कह सकते हैं कि हमारी संस्कृति सुरु से ही आधुनिक थी जो बाहरी आक्रांताओं के कारण धूमिल पड़ती गई। हमारे ऋषि मुनि चिकित्सा पद्धति से लेकर टेक्नोलॉजी तक, हर बात का ज्ञान उन्हें था।समय के अनुसार प्रक्रिया अलग रही होंगी लेकिन ये विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि उच्चतम रही होंगी ।

उन्हें इस बात का भी भान था कि....

कौन सी चीज खाने लायक है और कौन सी नहीं...?

सनातन संस्कृति शर्वश्रेष्ठ है और इसे अपनी आस्था का केंद्र बनाए रखें, कभी किसी की बात सुनकर , अपनी संस्कृति की पकड़ को ढ़ीली न करे ।

आपने इसे ध्यान से पढ़ा, आपका बहुत - बहुत आभार।

सनातन संस्कृति शर्वश्रेष्ठ🙏🏼🙏🏼


Disclaimer : Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है। ये आर्टिकल इसकी पुष्टि नहीं करता है।


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✍️Shikha Bhardwaj ❣️

Shikha Bhardwaj

Hi, I'm Shikha. I help English learners improve vocabulary, grammar, speaking confidence, and communication skills through practical lessons and real-life examples.

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