ऐ ज़िन्दगी! | एक स्त्री की उड़ान, आत्मविश्वास और अपनी पहचान की कवित

ऐ ज़िन्दगी! | एक स्त्री की उड़ान, आत्मविश्वास और अपनी पहचान की कविता

"जब उम्मीदें अपने भीतर जन्म लेती हैं, तब उड़ान किसी आसमान की मोहताज नहीं रहती।"


ऐ ज़िन्दगी!

ज़िन्दगी हर किसी को एक जैसा रास्ता नहीं देती। कुछ लोगों के हिस्से आसान मंज़िलें आती हैं, तो कुछ के हिस्से संघर्ष, इंतज़ार और अनगिनत ठोकरें। लेकिन शायद असली पहचान मंज़िल से नहीं, उस सफ़र से बनती है जिसे हम गिरते-सँभलते तय करते हैं।

यह कविता केवल मेरे मन के शब्द नहीं है, बल्कि उन वर्षों की आवाज़ है जब मैंने दूसरों की उम्मीदों में जीना सीखा और फिर एक दिन अपनी उम्मीदों को पहचानना भी।

यह कविता हर उस स्त्री को समर्पित है जिसने कभी अपने सपनों को टाल दिया, अपनी पहचान को पीछे रखा, या अपनी उड़ान को किसी और की सीमाओं में बाँध दिया।

क्योंकि एक दिन हर स्त्री को यह एहसास होता है—

"मेरी पहचान किसी और से नहीं, मुझसे बनेगी।"


 ऐ ज़िन्दगी!

इस धूप-छाँव के खेल में
ख्वाबों और खयालों के मेल में....

बहुत से अरमान बिखरे हैं...
बहुत बार हौसलों ने दम तोड़ा है।

बहुत बार खुद को समझाया और बहलाया है।
उम्र का एक लम्बा सफ़र उम्मीदों के
शहर में सो कर गुजरा है।

अब जब सुबह हुई है....
माना कि बहुत देर से हुई है ।

धुंध की एक मोटी परत छटी है।
तो फिर से अरमानों को नए पंख लगे है।

ऐ ज़िन्दगी!


फिर वही उम्मीदों का नया सफ़र ...
उल्लास का एक नया शहर ...।

फ़र्क बस इतना है इस बार—
सफ़र मेरा है,
मंज़िल मेरी है,
और उम्मीदों का शहर भी मेरा अपना है।

माना मैं स्त्री हूँ,
बंदिशों की गठरी कंधों पर लिए चलती आई हूँ।
पर अब मेरी उड़ान का फ़ैसला
मेरे अपने पंख करेंगे।

पर बात कोई नई तो नहीं है।
भारत भूमि में वीरांगनाओं की कमी तो नहीं रही है।

नहीं रानी लक्ष्मी और अहिल्या बाई न सही...
मुझे मेरी शिखा की ही पहचान चाहिए।

ऐ ज़िन्दगी!

माना मै दरिया, (स्त्री) समंदर (परिवार) मेरा जहां है।
उस समंदर में सीपी - सा ही सही मेरा अपना एक ठाँव चाहिए।

तूफ़ानों से तो पुराना राब्ता है अपना,
अब मन गहरा समंदर-सा शांत,
पर भीतर ज्वालामुखी-सा विश्वास चाहिए।

रगों में बहता रहे साहस,
और आँखों में अनंत आकाश चाहिए।

पूर्णिमा की रात-सा उजला मन,
क्षितिज से मिलने की प्यास चाहिए।


हर ठोकर के बाद फिर उठने का
अटल विश्वास चाहिए।

ऐ ज़िन्दगी!

मुझे मंज़िल नहीं,
सफ़र की पहचान चाहिए।
भीड़ में चलना नहीं,
अपनी अलग उड़ान चाहिए।

नहीं लिखना इतिहास मुझे
पर अपनी शर्त अपनी पहचान चाहिए।

गिरूं, सँभलू पर कभी रुकूँ नहीं।
अब मुझे सिर्फ जीना नहीं, 
अपनी हर साँस का अर्थ चाहिए।

ऐ ज़िन्दगी!

अब बस मन में एक ज्योत नई जले,
सुबह नई उड़ान, शाम यही सुकून मिले
कि मैंने भी अपने सपनों को नई पंख नया आकाश दिया है।

लेखक की बात

यह कविता मैंने पहली बार वर्ष 2021 में लिखी थी। उस समय यह केवल मेरे मन की भावनाएँ थीं। समय के साथ जीवन ने बहुत कुछ सिखाया—कुछ सपने टूटे, कुछ रिश्ते बदले, कुछ उम्मीदें खत्म हुईं और कुछ नई जन्मीं।

आज जब मैंने इस कविता को फिर से पढ़ा, तो लगा कि मैं भी बदल चुकी हूँ।

अब मैं केवल उम्मीदों की बात नहीं करती, बल्कि उन हौसलों की बात करती हूँ जो उम्मीदों को सच करने का साहस रखते हैं।

यह कविता मेरे जीवन की यात्रा है—एक ऐसी यात्रा जिसमें मैंने सीखा कि पहचान किसी से माँगी नहीं जाती, उसे अपने कर्म, अपने साहस और अपने आत्मविश्वास से बनाया जाता है।

यदि इस कविता की कोई पंक्ति आपके मन को छू जाए, तो समझिए कि मेरी लेखनी सफल हुई।

Readers Reflection

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Quote Box

"उम्मीदें दूसरों से मिल सकती हैं, लेकिन उड़ान हमेशा अपने हौसलों से मिलती है।"

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"यह लेख केवल विचार नहीं, बल्कि मेरे जीवन के अनुभवों से निकले हुए शब्द हैं। यदि इन शब्दों में आपको अपने जीवन की झलक मिले, तो यही मेरे लेखन की सबसे बड़ी सफलता होगी।"



Shikha Bhardwaj

Hi, I'm Shikha. I help English learners improve vocabulary, grammar, speaking confidence, and communication skills through practical lessons and real-life examples.

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