कन्यादान_kanyadaan

कन्यादान(kanyadan)

कन्यादान(kanyadan)



बॉलीवुड का सबसे शॉफ्ट कार्नर हिन्दू धर्म के रिवाज़ो पर प्रहार करने का काम बन गया है, वो भी न जाने कब से।
अभी हाल - फ़िलहाल कन्यादान (kanyadaan)को एक पारंपरिक ड्रेस के प्रचार की आर में टारगेट किया गया और कन्यादान(kanyadan) जैसे पवित्र रिवाजों पर सवाल खड़ा कर दिया।
यकीनन जिसने ये स्क्रिप्ट लिखी, उसे इस पवित्र रिवाज़ो के बारे में कुछ भी पता नही होगा, और एक मूर्ख की तरह कन्यादान(kanyadan)जैसे पवित्र रश्म को ही गलत ठहरा दिया।

कन्यादान vs कन्यामान - 
विचार कीजिए कि सनातन संस्कृति के पीछे हाथ धोकर पड़ने वाला कौन है?

हमारे घर की 18-19 साल की बच्चियाँ जिनलोगों का अभी अभी कॉलेज में एडमिशन हुआ है, वो पहले कन्यादान(knyadan)जैसे पवित्र संस्कार का टेलिविजन पर गलत ठहराते हुए देखती हैं और फिर उससे प्रभावित होती है और उनको भी बेटी दान जैसी बातें ढकोसले लगने लगती है।
टेलीविजन चैनल वाले अपने तर्क और कुतर्क से यंग जेनरेशन को प्रभावित करने में कामयाब हो जाती है
 फिर टीवी पर चल रहे वाद - विवाद को देखते हुए अपने ही घर के गार्जियन(माँ- पापा) से सवाल पूछना शुरू कर देते हैं "व्हाट्स रॉन्ग विद दिस ऐड मम्मा - पापा? व्हाय ऑल द हिंदूस आर अगेंस्ट दिस ऐड? आलिया इज़ राइट, डॉटर्स आर नॉट वन्स पर्सनल ऐसेट्स, एनी वन कैन डोनेट देम। डॉटर्स आर लव सो कन्यादान इस रॉन्ग एंड कन्यामान इज राइट।

अधिकांशतः हम पेरेंट्स अपनी जिंदगी के लगभग चालीस से पैतालिस बसंत देख चुके होते है, ज़िन्दगी का तजुर्बा और अपनी संस्कृति के खिलाफ अपने ही बच्चों का इस तरह से सवाल, कहीं न कहीं अपनी आधी - अधूरी परवरिश की ओर इंगित करता है।  कन्यादान(kanyadan) जैसे पवित्र रश्म पर मैंने अपनी ही बेटी के सवाल पर गहरी सांस छोड़ी। टीवी का रिमोट उठाकर उसकी आवाज़ को म्यूट किया और अपनी बेटी की तरफ बस यूं ही थोड़ी देर तक उसे देखती रही....सोचने पर मजबूर हो गई कि क्या हमनें अपने बच्चों को केवल इतना ही संस्कार दिया है कि वे एक जरा सी TV के ऐड पर बिना सोचे-समझे अपनी ही संस्कृति पर सवाल उठा देंगे। मोबाइल फोन में फेसबुक की पोस्ट्स पर आलिया को सपोर्ट करते हुए और पोस्ट करते हुए देखते ही रही , फिर बड़े ही धर्य और गंभीरता के साथ बेटी को कन्यादान(kanyadaan)का अर्थ समझाने की कोशिश करने लगी। मुस्कुराते हुए अपने बेटी के सर पर हाथ रखते हुए बोली। मेरी बेटी भी मेरी तरफ देखने लगी और बोली व्हाट हैपेंड मॉम?
मैं थोड़ी देर सोचने लगी फिर समझाते हुए बोलने लगी "पिछले हफ्ते जब मैंने तेरे लिए साड़ी ली थी तो लगा तू कितनी बड़ी हो गई लेकिन आज तेरी बातें सुनकर पता चल रहा है तू तो अभी भी वैसी 
 छोटी सी है जैसी बचपन में हुआ करती थी। किसी भी बातों के थ तक जाए बिना, अभी भी तुझे आसानी से कोई ठग सकता है। पता है, तुझे तू बचपन मे जुगनू के पीछें खूब भागा करती थी।
हर वो चमकती चीज़ तुझे खूब पसंद थी। मैं तब भी तुम्हे भ्रमित होने से बचाने की कोशिश में लगी रहती थी और आज भी मझे तुम्हें समझाना पड़ रहा है।
ये जो आलियाभट्ट कन्यामान का ढोंग इस ऐड में कर रही है, एडुकेशन के मामले में बिल्कुल ही फ़ेक है।फिर ये सनातन संस्कृति कन्यादान(kanyadan) जैसे पवित्र रश्म जिसकी abcd इसे पता नही, ये कैसे  बोल सकती है।
मैं अपनी बेटी को फिर से समझाने में लग गई। तू जब छोटी थी,रात में जलते रंग बिरंगे नाइटबल्ब को देखकर भी तू यही कहती थी कि माँ देखो, जुगनू,और जुगनू को देखकर लाइट बल्ब।

बेटी ने मुंह बनाते हुए कहा "व्हाट मॉम!" मैं ने फिर से मुस्कुराते हुए कहा "तू अब भी झूठी चकाचौंध देखकर आकर्षित हो जाती है।" बेटी प्रश्नवाचक दृष्टि से मुझे देखने लगी। "तुझे पता है 'नन्ही', 'मान' किसे कहते हैं?" नन्ही ने तुरंत अपने फोन में गूगल खोलते हुए कहा "होल्ड ऑन मॉम, आई विल टेल यू।
मैं ने फोन की स्क्रीन पर हाथ रखते हुए कहा गूगल पर मतलब ढूंढेगी तो बताएंगे किसी वस्तु का नाप लेकिन इसका एक अर्थ और होता है। मान, मतलब आदर, इज्ज़त, सम्मान। कन्यामान, इस शब्द को तुम आज के बच्चे हैशटैग लगाकर जो प्रसिद्ध कर रहे हो, ये तुम्हारे लिए नया होगा। इसके पीछे के जिस भाव को तुम दर्शाना चाह रहे हो वो तुम लोगों के लिए नए हैं। हम और हमारी पहले की असंख्य पीढियां कन्या के मान और सम्मान के लिए हमेशा से प्रतिबद्ध रही हैं।

मैं बोलती गई ,इतिहास के पन्ने पलटकर देखो जरा नन्ही, कन्या का जो स्थान हमारे सनातन धर्म में है वो शायद ही किसी अन्य धर्म में होगा। हम कन्याओं को पूजते हैं, हमने उन्हें देवी का पद दिया है तो तुम्हें क्या लगता है कि हम उनका मान नहीं करेंगे? हम तो खुद उन्हीं के जने हुए हैं, हमारी क्या औकात की हम उन्हें कुछ दें, हमारा जीवन तो खुद हमें उन्हीं की दी हुई भेंट है और तुम्हें लगता है उन्हीं के दिए हुए जीवन में हम उन्हें मान दिए बिना ही जीवित हैं। 
बेटियाँ कभी पराई नही होती है, वो तो अपने माता - पिता के जिगर का टुकड़ा होती है और न ही ऐसी कोई धन। क्योंकि धन तो खर्च हो जाती है।बेटियाँ तो वो अनमोल मोती है जो दो परिवारों को जोड़कर एक माला बनाती है।

नन्ही ने कहा "बट मॉम..." लेक़िन मैंने उसकी बात काटते हुए कहा "ये जो तुम आज मेरे सामने जींस पहनकर बैठी हो, हाथ में महंगा फोन और अनलिमिटेड इंटरनेट का लुत्फ उठा रही हो, अपनी मर्ज़ी के हिसाब से खा पी रही हो, पहन ओढ़ रही हो, घूमने जा रही हो, दोस्त बना रही हो, अपने विचार मेरे सामने, समाज के सामने रख रही हो, ये सब मान ही है जो हम तुम्हें देते हैं क्योंकि तुम हमारी बेटी ही नहीं, एक कन्या भी हो। बचपन में नवरात्रि के दिनों में हमने तुम्हारी पूजा की है, तुम्हें साक्षात देवी मानकर, तुम्हारे पैर छुए हैं, पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ, और आज तुम और तुम्हारे जैसी नई पीढ़ी के बच्चे हमें सिखा रहे हैं कि हमें कन्या का मान करना चाहिए।

बच्चें को समझाते वक्त कभी कभी स्वभाव में सख्ती की भी जरूरत पड़ती है, इसलिए मैंने भी उसे अब थोड़े से कड़क आवाज़ में समझाना सुरु किया और अब मेरी आवाज थोड़ी ऊंची हो गई। "एक बार उन मजहब वालों के समाज में, उनके देशों में जाकर देखो, वहां कन्याओं की क्या स्थिति है? वहां अपनी मर्जी से घूमना फिरना, पहनना छोड़ो अपनी मर्जी से खा भी नहीं सकती वो कन्याएं जिन्हें वहां के लोग खा तून कहते हैं। इस शब्द का मतलब समझती हो, क्यों उन्हें वहां खा तून कहते हैं? खा तून मतलब खाओ और तुनक जाओ। वहां स्त्रियों को सिर्फ और सिर्फ भोग का सामान समझा जाता है और यहां स्त्रियों को भजा जाता है।यानी उसकी इज्ज़त की जाती है। और अगर तुम्हें ये सब आज के भारत में दिख रहा है तो ये जहर भी उन्हीं मजहबी लोगों का फैलाया हुआ है। एक बार तुम अगर अपनी आंखों से वो सब देख लोगी ना तो तुम्हें कन्यामान का सही अर्थ पता लग जायेगा और मैं तो हैरान हूं कि अफगानिस्तान की स्थिति देखने के बाद भी तुम कैसे ये कह सकती हो। थोड़ी देर के लिए मैं चुप हो गई। नन्ही(बेटी) ने भी कुछ नहीं कहा। थोड़ी देर बाद फिर मैं बोलना शुरू की "बेटा कन्यादान का अर्थ ये नहीं कि हम अपनी बेटी किसी और को दे रहे हैं क्योंकि अब हम उसकी परवरिश नहीं कर सकते या उसके खर्चे नहीं उठा सकते। अरे जिस मां बाप ने कन्या को जन्म दिया वो जीवनभर उसका पालन पोषण कर सकते हैं लेकिन कन्यादान करने के पीछे समाज का एक बहुत बड़ा हित छुपा होता है। कन्यादान, अग्नि को साक्षी मानकर, सभी देवी देवताओं का आह्वान कर के, अपनी कन्या को एक योग्य वर के हाथों में सौंपने का प्रण होता है ताकि वो कन्या एक नए परिवार में जाकर एक नई पीढ़ी के निर्माण की सृजना बन सके। एक ऐसे समाज का निर्माण कर सके जहां प्रेम, वात्सल्य और सम्मान हो, दो परिवारों का मिलन आपसी सौहार्द से हो,वर के गोत्र को ग्रहण कर नए कूल का सृजन हो और वर भी उसका वरण पूरे मनोयोग से सम्मान के साथ  करता है और वचन देता है कि जो स्त्री अपनी जननी और जन्मभूमि को त्याग कर, बिना किसी स्वार्थ के, परमार्थ की इच्छा से केवल समाज के हित के लिए उसके पास आ रही है वो उसका आजीवन भरण, पोषण और रक्षा करेगा। जिस अग्नि कुंड को साक्षी मानकर सात फेरे लेते हैं, हर एक फेरे में वो एकदूसरे के लिए समर्पित औऱ वचनबद्ध होते हैं।

कन्यादान की ये व्याख्या सुनकर नन्ही तो हैरान ही हो गई। उसने कहा "सॉरी मॉम, मुझे तो ये सब पता ही नहीं था। अच्छा आप ये सब दुबारा एक्सप्लेन करोगे क्या, वो मेरा फ्रेंड है ना सदफ़, उसे बताना है कि कन्यादान की ये वैल्यू होती है। वो अक्सर कहता है कि तुम हिंदुओं के रीति रिवाज बहुत...

 नन्ही(बेटी) की बातें सुनकर फिर से मुझे गुस्सा आने लगा लेक़िन संयम के साथ मैं फिर उसे समझाने लगी।अरे वो होता कौन है हमारे रीति रिवाजों पर उंगली उठाने वाला???" नन्ही की बात पूरी सुने बिना ही मैं गुस्से से गरज पड़ी। जिस मज़हब में माँ का वन्दन नही, बहन का कोई स्थान नही, पत्नी की कोई इज़्ज़त नही, बस मौलानाओं और मर्दो के ख़ुशी का रिवाज हो,"किसने हक दिया उसे कि वो हमसे प्रश्न करे हमारे रीति रिवाजों को लेकर वो भी तब जब वो उत्तर सुनने के लायक भी नहीं!!! किसने अधिकार दिया उसे कि वो हमारे धर्म, हमारे धार्मिक स्थान, हमारे संस्कार, हमारे रीति रिवाजों के बारे में टिप्पणी करे? आखिर किसने??

नन्ही के मुंह से टूटे फूटे से बोल निकले "वो मैं... बस....

"नन्ही"  "जब वो आरिफ तुमसे तुम्हारे सनातन धर्म के बारे में सवाल करता है तो तुम चुप हो जाती हो, जब वो हमारे धार्मिक स्थानों के बारे में उल्टा सीधा कहता है तो तुम उसे जवाब नहीं देती, जब वो हमारे रीति रिवाजों पर उंगली उठाता है तुम उसी का साथ देती हो। कभी तुमने उस से पलटकर उसके मजहब के बारे में सवाल किया है? कभी उस से पूछा है कि हलाला क्यों किया जाता है? कभी जानने की कोशिश की है कि वो तीन तलाक के फैसले का इतना विरोध क्यों कर रहे थे? अरे ये ऐसे लोग हैं नन्ही कि अगर इनका अपना स्वार्थ ना हो ना तो ये स्त्रियों को पानी तक न पीने दें। ऐसे लोगों को क्या हक है कि हमारे धर्म, हमारे रीति रिवाजों, हमारे कन्यादान(kanyadaan) जैसे तप पर सवाल उठाएं।

               हमारी संस्कृति हमारा अभिमान
                                    




"नन्ही, मैंने तुम्हें बचपन से सिखाया है कि जब तक कोई काम तुम खुद अच्छे से करना ना सीख लो तब तक दूसरों को उसके बारे में ज्ञान न दो, अधूरा ज्ञान बहुत हानिकारक होता है। जिस नैतिकता का पाठ ये लोग हमें पढ़ाने की कोशिश करते हैं, इनका खुद उस से दूर दूर तक कोई संबंध नहीं इसलिए ऐसे लोगों के फालतू सवालों का या तो मुंह तोड़ जवाब दो या इनका मुंह ही तोड़ दो लेकिन अपने सनातन पर कभी किसी को उंगली मत उठाने दो। यही हमारा सच्चा धर्म है।दुनियाभर में केवल सनातन धर्म ही है,जो सभ्य और संदर्भित है।विज्ञान को भी हमारे सनातन संस्कृति के आगे विवश होना पड़ता है।
हमारा भारत आज अगर थोड़ा बहुत पिछड़ा हुआ है,  तो इन्ही सब बाहरी आक्रांताओं की वजह से। जिसने भारत को लूट खसोट कर बर्बाद कर दिया और उसके बाद भी जो बचा, वो राजनीतिक महत्वाकांछा के कारण बर्वाद होता गया, और न ही उसने कभी बॉलीवुड पर शिकंजा कसा कि वो यूँ ही हमारे धर्म के पीछे न पड़े।

नन्ही मेरी बातों से काफी प्रभावित होती हुई मालूम पड़ रही थी। उसने मुझे वचन भी दिया कि आज के बाद वो खुद भी अपने धर्म के बारे में जानेगी और दूसरों को भी उसके बारे में बताएगी। 

यूट्यूब पे टेलीविजन पर शत्रु बोध का ज्ञान पेलने वालों विचार करो शत्रु कौन है? बाहरी शत्रु से हम लड़ सकते है पर जो अंदर से सनातन संस्कृति को खोखला कर रहे है उनसे कौन लड़ेगा ?

कड़वा  सच।

शत्रु बोध नहीं हमारा ज्ञान बोध ही हमारी सनातन संस्कृति की रक्षा करेगा। देर हो चुकी है, लेकिन अंत नही, हमे फिर से इसे ससक्त भावनाओं के साथ सुरु करना पड़ेगा।
थोड़ा ही सही, 2 पेज ही सही भागवत और रामचरित मानस का पाठ बच्चो के साथ करते रहे। जब तक हम रामचरितमानस, भगवद्गीता को समझेगे नहीं तब तक हम भ्रमित ही रहेंगे।

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इतना ही नही, आप चाहे जितने भी व्यस्त क्यों न हो, अपने बच्चों को समय दे, उन्हें अपनी संस्कृति से परिचय करवाए।
हमारी संस्कृति में तो सुबह आँख खोलने से लेकर रात को सोते वक्त तक के संस्कारों का पालन करने का बताया गया है।जिसका हमने बड़े ही दुर्दिन्ता से अवहेलना किया है, ये सही नही है।लेकिन कहते हैं कि "जब जागो तभी सवेरा"।तो आप आज से ही इन नियम पद्दति पर काम सुरु करें वरना ईश्वर न करे कि भारत को भी कभी अफगानिस्तान जैसी स्थिति का सामना करना पड़े।
नमस्कार, उम्मीद है आप सबको ये कन्यादान(kanyadaan)के ऊपर सुक्षतम सा मेरा ये लेख आप सबको पसंद आए।
धन्यवाद।
                            हमारी संस्कृति हमारा अभिमान
                                     ✍️Shikha Bhardwaj ❣️

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