अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) क्या है? तेरहवां महीना क्यों माना जाता है?
भारतीय पंचांग और सनातन परंपरा में अधिक मास, जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है, अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना जाता है। इस महीने में भगवान विष्णु की विशेष पूजा-अर्चना, दान, जप, तप और सत्संग का महत्व बताया गया है।
लेकिन एक प्रश्न अक्सर लोगों के मन में आता है कि जब वर्ष में केवल 12 महीने होते हैं, तो यह तेरहवां महीना कहां से आ जाता है?
इस लेख में हम अधिक मास का धार्मिक, पौराणिक और वैज्ञानिक आधार सरल भाषा में समझेंगे।
अधिक मास क्या होता है?
अधिक मास वह अतिरिक्त महीना है जो भारतीय चंद्र-सौर पंचांग में समय के संतुलन के लिए जोड़ा जाता है।
हमारा पारंपरिक हिंदू कैलेंडर मुख्य रूप से चंद्रमा की गति पर आधारित है, जबकि ऋतुएं और मौसम सूर्य की गति के अनुसार चलते हैं।
चंद्र वर्ष और सौर वर्ष के बीच हर साल लगभग 11 दिनों का अंतर रह जाता है। यही अंतर धीरे-धीरे बढ़ता रहता है।
जब यह अंतर लगभग 29 से 30 दिनों के बराबर हो जाता है, तब पंचांग में एक अतिरिक्त महीना जोड़ दिया जाता है, जिसे अधिक मास कहा जाता है।
अधिक मास को तेरहवां महीना क्यों कहा जाता है?
सामान्यतः एक वर्ष में 12 महीने होते हैं।
लेकिन चंद्र वर्ष लगभग 354 दिन का होता है, जबकि सौर वर्ष लगभग 365 दिन 6 घंटे का होता है।
अर्थात:
- चंद्र वर्ष = लगभग 354 दिन
- सौर वर्ष = लगभग 365 दिन
- अंतर = लगभग 11 दिन
हर वर्ष यह अंतर बढ़ता जाता है।
लगभग 32 महीने 16 दिन के बाद यह अंतर एक पूरे महीने के बराबर हो जाता है। तब उस वर्ष में एक अतिरिक्त महीना जोड़ दिया जाता है।
इसी कारण उस वर्ष में 12 की जगह 13 महीने हो जाते हैं, इसलिए इसे तेरहवां महीना कहा जाता है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अधिक मास
ऊपर दिया गया अंतर बताता है कि सौर और चंद्र वर्ष में लगभग 11 दिनों का अंतर होता है।
यदि यह समायोजन न किया जाए तो:
- त्योहार ऋतुओं से दूर होते जाएंगे।
- होली, दीपावली, नवरात्रि आदि का समय धीरे-धीरे बदल जाएगा।
- कृषि और मौसम आधारित परंपराओं में असंतुलन आ जाएगा।
इसलिए अधिक मास समय और ऋतु चक्र को संतुलित रखने का वैज्ञानिक उपाय है।
पुरुषोत्तम मास नाम कैसे पड़ा?
पौराणिक कथाओं के अनुसार जब यह अतिरिक्त महीना बना तो अन्य महीनों की तुलना में इसका कोई विशेष स्वामी नहीं था।
इस कारण इसे "मल मास" कहकर उपेक्षित किया जाने लगा।
दुखी होकर यह महीना भगवान विष्णु के पास पहुंचा। भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम "पुरुषोत्तम" प्रदान किया और कहा कि यह महीना विशेष रूप से उनका प्रिय होगा।
तभी से अधिक मास को पुरुषोत्तम मास कहा जाने लगा।
पुरुषोत्तम मास का धार्मिक महत्व
सनातन धर्म में यह महीना आत्मशुद्धि, साधना और आध्यात्मिक उन्नति का समय माना जाता है।
इस महीने में:
1. भगवान विष्णु की पूजा
भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण और नारायण की विशेष उपासना की जाती है।
2. जप और तप
मंत्र जाप, ध्यान और भजन-कीर्तन का विशेष फल प्राप्त होता है।
3. दान-पुण्य
गरीबों की सहायता, अन्नदान, वस्त्रदान और गौसेवा का महत्व बढ़ जाता है।
4. धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन
भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत और विष्णु पुराण का पाठ शुभ माना जाता है।
5. आत्मचिंतन
यह महीना स्वयं को बेहतर बनाने और जीवन का मूल्यांकन करने का अवसर प्रदान करता है।
पुरुषोत्तम मास और हिरण्यकश्यप की कथा से मिलने वाली सीख
पुरुषोत्तम मास भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। भगवान विष्णु के प्रति अटूट भक्ति का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद की कथा में मिलता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार , हिरण्यकश्यप ने ब्रह्मा जी से साल के बारहों महीने में भी न मरने का वरदान माँगा था। और कहते हैं कि इसी अधिक मास में हिरण्यकश्यप का भी वध भगवान विष्णु ने नरसिंघ अवतार में किया था।
असुरराज Hiranyakashipu ने कठोर तपस्या करके वरदान प्राप्त किया और स्वयं को सर्वशक्तिमान समझने लगा। उसने अपने राज्य में भगवान विष्णु की पूजा पर प्रतिबंध लगा दिया।
लेकिन उसका पुत्र Prahlada भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को अनेक कष्ट दिए, परंतु उसकी भक्ति डिगी नहीं।
अंततः भगवान विष्णु ने Narasimha अवतार धारण कर हिरण्यकश्यप का वध किया और अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा की।
इस कथा से मिलने वाली शिक्षा
- अहंकार का अंत निश्चित है।
- सच्ची भक्ति किसी भी कठिनाई से बड़ी होती है।
- भगवान अपने भक्तों की रक्षा अवश्य करते हैं।
- पुरुषोत्तम मास में भक्ति, जप और ईश्वर के प्रति समर्पण का विशेष महत्व है।
अधिक मास में कौन से कार्य नहीं किए जाते?
परंपरागत रूप से अधिक मास में कुछ मांगलिक कार्यों को टाला जाता है:
- विवाह
- गृह प्रवेश
- मुंडन संस्कार
- नए व्यवसाय का शुभारंभ
- बड़े शुभ संस्कार
हालांकि पूजा, दान, जप, तप और आध्यात्मिक कार्य पूरे उत्साह से किए जाते हैं।
क्या अधिक मास हर वर्ष आता है?
नहीं।
अधिक मास लगभग हर 32 महीने 16 दिन 8 घंटे के बाद आता है।
इसलिए यह लगभग हर 2 वर्ष 8 महीने में एक बार देखने को मिलता है।
अधिक मास हमें क्या सिखाता है?
अधिक मास केवल एक अतिरिक्त महीना नहीं है।
यह हमें सिखाता है कि:
- जीवन में आत्मचिंतन आवश्यक है।
- भौतिक उपलब्धियों के साथ आध्यात्मिक विकास भी महत्वपूर्ण है।
- समय का संतुलन बनाए रखना प्रकृति का नियम है।
- ईश्वर की भक्ति और सेवा से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं।
निष्कर्ष
अधिक मास या पुरुषोत्तम मास हिंदू पंचांग की एक अद्भुत व्यवस्था है, जिसमें धार्मिक आस्था और वैज्ञानिक गणना दोनों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। चंद्र और सौर वर्ष के बीच के अंतर को संतुलित करने के लिए यह अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, इसलिए इसे तेरहवां महीना कहा जाता है।
धार्मिक दृष्टि से यह भगवान विष्णु को समर्पित अत्यंत पवित्र महीना माना जाता है, जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से यह हमारे त्योहारों और ऋतु चक्र को सही समय पर बनाए रखने का माध्यम है।
