क्या एक गृहिणी भी अपने लिए जी सकती है? | मैं भी ज़रूरी हूँ | एक गृहिणी की डायरी (भाग 5)

क्या एक गृहिणी भी अपने लिए जी सकती है? | मैं भी ज़रूरी हूँ | एक गृहिणी की डायरी (भाग 5) 



Introduction

कुछ दिन पहले मैं और मेरी बेटी यूँ ही बैठकर इधर-उधर की बातें कर रहे थे।

बातों-बातों में चर्चा सबके पसंदीदा खाने तक पहुँच गई।

मै संयुक्त परिवार में रहती हूँ।

इसलिए मुझे घर के हर सदस्य की पसंद अच्छी तरह याद है।

किसे किस तरह की सब्ज़ी पसंद है...

कौन मीठा कम खाता है...

कौन बिना चाय के दिन शुरू नहीं करता...

ये सब मुझे पता है।

फिर अचानक मेरी बेटी ने मुस्कुराकर पूछा—

"मम्मी, आपको सबसे ज़्यादा क्या खाना पसंद है?"

मैं कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत हो गई।

यकीन मानिए...

मेरे पास इस सवाल का कोई स्पष्ट जवाब नहीं था।

बहुत सोचने के बाद भी मुझे बस इतना ही याद आया कि मुझे चावल और ग्रेवी वाली मसालेदार सब्ज़ी अच्छी लगती है। 

लेकिन...

क्या सचमुच यही मेरी पसंद थी?

या वर्षों तक सबकी पसंद को अपनी पसंद बनाते-बनाते...

मैं अपनी ही पसंद भूल गई थी?

उसी पल अनायास शादी से पहले वाली शिखा याद आ गई।

वह शिखा...

जो बहुत कम खाती थी,

लेकिन अपनी पसंद को लेकर बहुत नखरे भी करती थी।

जिसे पता था कि उसे क्या अच्छा लगता है...

और क्या बिल्कुल नहीं।

मैं कुछ देर तक उसी शिखा को अपने भीतर खोजती रही।

फिर मन में एक सवाल उठा...

एक ऐसा सवाल, जिसने मुझे भीतर तक झकझोर दिया—

"क्या मैं भी ज़रूरी हूँ?"

सवाल बहुत छोटा था...

लेकिन उसका उत्तर ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मैं अपने जीवन के कई वर्षों में लौट गई।

एक गृहिणी के रूप में मैंने हमेशा यही सीखा कि पहले घर...

फिर परिवार...

फिर रिश्ते...

और यदि समय बच जाए, तो शायद मैं।

धीरे-धीरे "मैं" हर सूची के अंत में पहुँच गई।

इतना अंत में कि कई बार उसका अस्तित्व ही धुँधला पड़ने लगा।

फिर एक दिन एहसास हुआ...

यदि मैं स्वयं को ही भूल जाऊँगी,

तो मेरी मुस्कान भी अधूरी होगी,

मेरे रिश्ते भी,

और मेरे सपने भी।

उसी दिन मैंने खुद से कहा—

"मैं स्वार्थी नहीं हूँ... लेकिन मैं भी ज़रूरी हूँ।"

क्या स्वयं का ख्याल रखना स्वार्थ है?

हमारे समाज में अक्सर बेटियों को बचपन से यही सिखाया जाता है—

"सबका ध्यान रखना..."

"सबकी बात सुनना..."

"बड़ों का सम्मान करना..."

"थोड़ा सह लेना..."

मेरी माँ ने भी मुझे यही सिखाया था।

और सच कहूँ, उन्होंने जो सिखाया, वह प्रेम और संस्कार से भरा था।

लेकिन शायद एक बात हम दोनों से छूट गई...

"थोड़ा सह लेना" का पैमाना किसी ने नहीं बताया।

कितना थोड़ा?

कब तक थोड़ा?

और किस कीमत पर थोड़ा?

धीरे-धीरे वह "थोड़ा" इतना बढ़ता गया कि कई बार अपनी इच्छाएँ, अपनी पसंद और अपनी पहचान भी उसी में कहीं खोती चली गईं।

समय के साथ मैंने जीवन से एक बात सीखी—

अपने लिए समय निकालना...
खुद को समझना...
और खुद को खुश रखना...
स्वार्थ नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है।

क्योंकि यदि मैं भीतर से ही खाली हो जाऊँ,

तो दूसरों के जीवन में प्रेम, धैर्य और मुस्कान कैसे बाँट पाऊँगी?

शायद इसी एहसास ने मेरी सोच बदल दी।

और आज, यदि मैं अपनी बेटी को कोई एक सीख देना चाहूँ,

तो यही दूँगी—

"सबका ख़याल रखना, लेकिन खुद को कभी मत भूलना।"

क्योंकि जो स्वयं का सम्मान करना सीख लेता है,

वही दूसरों का सम्मान भी पूरे मन से कर पाता है।

जैसे दीपक को जलते रहने के लिए तेल चाहिए...

वैसे ही मन को भी प्रेम, विश्राम और सम्मान चाहिए।

यदि मन ही थक जाए, तो मुस्कान भी बनावटी लगने लगती है।

गृहिणी केवल एक भूमिका नहीं, एक व्यक्तित्व भी है

गृहिणी होना एक सुंदर जिम्मेदारी है।

लेकिन उससे पहले वह एक इंसान है।

उसकी भी अपनी पसंद होती है...

अपने सपने होते हैं...

कुछ अधूरी इच्छाएँ होती हैं...

कुछ शौक होते हैं जिन्हें वह अक्सर समय की कमी में पीछे छोड़ देती है।

एक अच्छी गृहिणी बनने के लिए अपनी पहचान खो देना आवश्यक नहीं है।

बल्कि अपनी पहचान को संजोकर रखना भी उतना ही आवश्यक है।

अपने लिए समय निकालना क्यों ज़रूरी है?

🌸 क्योंकि थका हुआ मन प्रेम नहीं बाँट सकता

जब मन लगातार थका रहता है, तो छोटी-छोटी बातें भी भारी लगने लगती हैं।

थोड़ा विश्राम...

कुछ पल की शांति...

और स्वयं के साथ बिताया गया समय...

मन को फिर से भर देता है।

✍️ क्योंकि सपनों को भी साँस लेने का अधिकार है

हर गृहिणी के भीतर कोई न कोई सपना जरूर होता है।

किसी को पढ़ना पसंद है...

किसी को संगीत...

किसी को चित्रकारी...

और मुझे...

लिखना।

जब मैं लिखती हूँ, तो लगता है जैसे मैं अपने भीतर के उस हिस्से से मिल रही हूँ, जो दिनभर की जिम्मेदारियों के बीच कहीं शांत बैठा मेरा इंतज़ार करता है।

🌿 क्योंकि खुश रहना भी एक जिम्मेदारी है

परिवार को सबसे अधिक क्या चाहिए?

एक खुश, स्वस्थ और संतुलित मन।

और वह तभी संभव है, जब गृहिणी स्वयं को भी महत्व दे।


मेरी छोटी-सी सीख (मेरी अपनी अनुभूति)

मैं भी कभी यही सोचती थी कि...

"पहले सारे काम पूरे हो जाएँ, फिर अपने लिए बैठूँगी।"

लेकिन गृहिणी के सारे काम कभी पूरे नहीं होते।

एक काम खत्म होता है...

दूसरा इंतज़ार कर रहा होता है।

फिर मैंने अपने दिन को ध्यान से देखना शुरू किया।

मैंने पाया कि अपने लिए एक घंटा नहीं...

सिर्फ़ दस मिनट भी काफी हैं।

योग के बाद की शांति...

ससुर जी के हाथों की बनी चाय...

डायरी के कुछ शब्द...

छत पर खिले फूल...

डूबते सूरज की लालिमा...

यही मेरे अपने पल हैं।

इन्हीं पलों ने मुझे धीरे-धीरे यह सिखाया—

यदि मैं स्वयं को भूल जाऊँगी, तो मेरे शब्द भी मुझे पहचानना छोड़ देंगे।

आज भी मेरी जिम्मेदारियाँ वही हैं।

लेकिन अब मैं अपने दिन से कुछ पल अपने लिए भी बचा लेती हूँ।

क्योंकि मैंने स्वीकार कर लिया है—

मैं केवल रिश्तों को निभाने वाली गृहिणी नहीं हूँ।

मैं एक संवेदनशील मन हूँ।

मैं एक लेखिका हूँ।

मैं एक सपने देखने वाली स्त्री हूँ।

और... मैं भी ज़रूरी हूँ।

Conclusion

यदि आप यह लेख पढ़ रही हैं और आपको लगता है कि आप हमेशा सबसे अंत में आती हैं...

तो आज एक छोटा-सा वादा स्वयं से कीजिए।

हर दिन पाँच या दस मिनट...

केवल अपने लिए।

क्योंकि जब आप स्वयं को महत्व देंगी, तभी दुनिया भी आपके महत्व को समझेगी।

याद रखिए—

गृहिणी होना आपकी पहचान का एक हिस्सा है।

पूरी पहचान नहीं।

आपकी मुस्कान...

आपकी रुचियाँ...

आपके सपने...

और आपका अस्तित्व भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

FAQs

क्या अपने लिए समय निकालना एक गृहिणी के लिए आवश्यक है?

हाँ। मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक संतुलन बनाए रखने के लिए प्रतिदिन कुछ समय केवल स्वयं के लिए निकालना बेहद आवश्यक है।

यदि पूरा दिन व्यस्त हो, तो शुरुआत कैसे करें?

दिन में पाँच या दस मिनट से शुरुआत करें। योग, ध्यान, पढ़ना, लिखना या शांत बैठना—जो आपको अच्छा लगे, वही करें।

क्या अपने शौक पूरे करना परिवार की जिम्मेदारियों के खिलाफ है?

नहीं। अपने शौक और सपनों को समय देना आपको और अधिक संतुलित, प्रसन्न और ऊर्जावान बनाता है।

एक गृहिणी अपनी पहचान कैसे बनाए रख सकती है?

अपनी रुचियों को जीवित रखकर, नए कौशल सीखकर और अपने लिए नियमित समय निकालकर।

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Call-to-Action

यदि इस लेख ने आपके मन की किसी अनकही भावना को शब्द दिए हों, तो इसे उन महिलाओं तक अवश्य पहुँचाइए जो हर दिन अपने परिवार के लिए जीती हैं, लेकिन कभी-कभी स्वयं को भूल जाती हैं।

और यदि आप भी एक गृहिणी हैं, तो आज कमेंट में केवल एक वाक्य लिखिए—

"मैं भी ज़रूरी हूँ।"

शायद यह वाक्य किसी और स्त्री को भी अपने अस्तित्व का महत्व याद दिला दे।

🌿 आज की अनुभूति

"मैंने दूसरों के लिए जीना कभी नहीं छोड़ा...
बस अब इतना सीखा है कि
अपने लिए जीना भी उतना ही आवश्यक है।
क्योंकि मेरा होना ही
मेरे पूरे परिवार की मुस्कान का आधार है।"

🌿 Aparichita की अनुभूति
"यह लेख केवल विचार नहीं, बल्कि मेरे जीवन के अनुभवों से निकले हुए शब्द हैं। यदि इन शब्दों में आपको अपने जीवन की झलक मिले, तो यही मेरे लेखन की सबसे बड़ी सफलता होगी।"


Shikha Bhardwaj

Hi, I'm Shikha. I help English learners improve vocabulary, grammar, speaking confidence, and communication skills through practical lessons and real-life examples.

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