असीम प्रकाश: जब अनंत ब्रह्म प्रेम में साकार हो जाता है.
असीम प्रकाश
ईश्वर को समझना कभी बहुत सरल लगता है और कभी अत्यंत कठिन।
कभी लगता है कि वह हमारे बिल्कुल पास हैं—हमारी सांसों में, प्रकृति में, प्रेम में और जीवन की हर छोटी-बड़ी घटना में। लेकिन कभी वही ईश्वर इतने विशाल, इतने व्यापक और इतने रहस्यमय प्रतीत होते हैं कि मन उन्हें समझने की कोशिश में स्वयं को बहुत छोटा महसूस करने लगता है।
शायद इसी अनुभूति ने मुझे इस मानस प्रवचन के अंश को “असीम प्रकाश” नाम देने के लिए प्रेरित किया।
ईश्वर उस प्रकाश की तरह हैं, जिसकी कोई सीमा नहीं। वह आकाश की तरह व्यापक हैं, लेकिन प्रेम की शक्ति ऐसी है कि वही असीम ब्रह्म एक माँ की गोद में भी समा जाते हैं।
यही ज्ञान और भक्ति का अद्भुत मिलन है।
असीम आकाश और हमारी सीमित दृष्टि
अर्थात मच्छर से लेकर गरुड़ तक असंख्य जीव इस विशाल आकाश में उड़ते हैं, लेकिन कोई भी उसके अंत तक नहीं पहुँच सकता।
आकाश असीम है।
हम उसे देखते हैं, उसके नीचे रहते हैं, उसके विस्तार को महसूस करते हैं, लेकिन उसकी सीमाओं को खोज नहीं सकते।
वेदांत में जीव और ब्रह्म के संबंध को समझाने के लिए घटाकाश और मठाकाश जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है।
घड़े के भीतर जो खाली स्थान है, वह भी आकाश है। घर के भीतर जो स्थान है, वह भी आकाश है।
लेकिन क्या घड़े में बंद दिखाई देने वाला आकाश वास्तव में छोटा हो गया?
नहीं।
घड़ा टूट जाए, घर की दीवारें गिर जाएँ, फिर भी आकाश वैसा ही रहता है।
सीमा केवल हमारे देखने की है, आकाश की नहीं।
इसी प्रकार शरीर की सीमाएँ हो सकती हैं, स्थान की सीमाएँ हो सकती हैं, लेकिन ब्रह्म की कोई सीमा नहीं होती।
असीम होने पर भी साकार रूप की आवश्यकता क्यों है?
यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है।
यदि ब्रह्म असीम और निराकार है, तो फिर मनुष्य उसे साकार रूप में क्यों देखना चाहता है?
उत्तर शायद हमारे जीवन की आवश्यकताओं में छिपा है।
असीम आकाश हमें उसकी विशालता का ज्ञान देता है, लेकिन यदि हमें धूप, वर्षा और तूफान से बचना है तो हमें एक घर की आवश्यकता होती है।
आकाश असीम है, लेकिन घर हमें आश्रय देता है।
इसी प्रकार जल सर्वत्र हो सकता है, लेकिन प्यास बुझाने के लिए हमें एक पात्र की आवश्यकता होती है।
घड़ा आकाश को छोटा नहीं करता, बल्कि हमारी आवश्यकता को पूरा करने का माध्यम बनता है।
ठीक वैसे ही निराकार ब्रह्म असीम है। वह सर्वत्र है। लेकिन हमारे हृदय को उससे संबंध बनाने के लिए कभी-कभी एक रूप, एक नाम और एक निकटता की आवश्यकता होती है।
यही वह स्थान है जहाँ ज्ञान और भक्ति एक-दूसरे से मिलते हैं।
समस्त ब्रह्मांड के स्वामी और दशरथ के आँगन के बिहारी
मंगल भवन अमंगल हारी।
द्रवउ सो दशरथ अजिर बिहारी।।
यहाँ भगवान को “दशरथ अजिर बिहारी” कहा गया है—अर्थात जो दशरथ जी के आँगन में विहार करते हैं।
सोचिए!
जो समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त हैं, उन्हें दशरथ जी के आँगन तक सीमित क्यों कहा गया?
क्या असीम ब्रह्म सचमुच छोटा हो गया?
नहीं।
ब्रह्म की असीमता कभी कम नहीं होती।
लेकिन प्रेम उसे इतना निकट ले आता है कि वही समस्त ब्रह्मांड का स्वामी एक पिता के आँगन में खेलता हुआ दिखाई देता है।
निराकार ब्रह्म हमारे ज्ञान को संतुष्ट करता है, लेकिन साकार ईश्वर हमारे हृदय को छूता है।
ज्ञान कहता है—वह सर्वत्र है।
भक्ति कहती है—वह मेरे पास है।
और शायद दोनों ही सत्य हैं।
असीम ब्रह्म जब माँ की गोद में समा जाता है
राम केवल “दशरथ अजिर बिहारी” ही नहीं हैं।
वह सिमटते-सिमटते माता कौशल्या की गोद में भी आ जाते हैं।
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| असीम प्रकाश, Asim prakash |
मानस की यह पंक्ति कितनी अद्भुत है—
व्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुण बिगत बिनोद।
सो अज प्रेम भगति बस कौशल्या के गोद।।
जो व्यापक हैं।
जो निरंजन हैं।
जो निर्गुण हैं।
जो अजन्मा हैं।
वही प्रेम और भक्ति के वश में होकर माता कौशल्या की गोद में आ जाते हैं।
यहाँ ज्ञान और प्रेम का सुंदर अंतर दिखाई देता है।
ज्ञान कहता है—वह असीम है।
प्रेम कहता है—वह मेरा है।
और प्रेम की यही शक्ति है कि वह असीम को भी अपने हृदय के सबसे निकट अनुभव कर लेता है।
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प्रेम की रेखा ज्ञान से बड़ी कैसे हो जाती है?
किसी वस्तु को छोटा दिखाने के दो तरीके हो सकते हैं।
पहला—उसे काटकर छोटा कर दिया जाए।
दूसरा—उसके सामने उससे भी बड़ी कोई वस्तु रख दी जाए।
ब्रह्म के साथ भी कुछ ऐसा ही है।
ज्ञान की दृष्टि से ब्रह्म असीम और व्यापक है।
लेकिन भक्त प्रेम की इतनी बड़ी रेखा खींच देता है कि उसके सामने व्यापक ब्रह्म भी छोटा दिखाई देने लगता है।
ध्यान रहे—ब्रह्म वास्तव में छोटा नहीं होता।
वह केवल प्रेम की दृष्टि से छोटा दिखाई देने लगता है।
इसीलिए ईश्वर को बाँधा नहीं जा सकता, लेकिन प्रेम उन्हें बाँध लेता है।
ईश्वर सीमित नहीं होते, लेकिन प्रेम उन्हें अपने भीतर समेट लेता है।
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यशोदा और बाल कृष्ण: जब प्रेम ने असीम को बाँधने की ठानीभगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप का एक अत्यंत सुंदर प्रसंग है। माता यशोदा उन्हें रस्सी से बाँधने का प्रयास करती हैं। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि रस्सी हर बार छोटी पड़ जाती है। एक छोटे से बालक को बाँधने के लिए रस्सी पर्याप्त नहीं हो रही। यह वही कृष्ण हैं जिनमें अनंत ब्रह्मांड समाए हुए हैं। लेकिन माता यशोदा उनके चमत्कार से प्रभावित होकर पीछे नहीं हटतीं। उनके लिए वह ब्रह्मांड के स्वामी नहीं, उनका नटखट बालक है। और प्रेम का यही अधिकार है। भक्त शायद यही कहता है— “ईश्वर! आप चाहे जितने बड़े हों, मेरे प्रेम से बड़े नहीं हो सकते।” ज्ञान ईश्वर की विशालता को देखता है। प्रेम ईश्वर की निकटता को महसूस करता है। ज्ञान कहता है—उन्हें समझो। भक्ति कहती है—उन्हें अपना बना लो। असीम को सीमित समझ लेना भी अधूरा हैयहाँ एक बात समझना बहुत आवश्यक है। यदि हम केवल इतना मान लें कि ईश्वर असीम हैं और बहुत दूर कहीं व्यापक रूप में विद्यमान हैं, तो शायद हमारा ज्ञान तो बढ़ेगा, लेकिन हृदय की तृप्ति अधूरी रह सकती है। और यदि हम केवल उन्हें एक सीमित रूप में ही बाँध दें, तो हमारा ज्ञान अधूरा रह जाएगा। इसलिए पूर्णता शायद दोनों को साथ लेकर चलने में है। उन्हें जानिए असीम। यही ज्ञान है। यही भक्ति है। और शायद यही साधना की सबसे सुंदर अवस्था भी है। ज्ञान और भक्ति का सुंदर मिलनब्रह्म की असीमता को जानना ज्ञान है। और उसी असीम ब्रह्म को अपने जीवन में, अपने हृदय में और अपने प्रेम में अनुभव करना भक्ति है। ज्ञान हमें बताता है कि ईश्वर हर जगह हैं। भक्ति हमें अनुभव कराती है कि ईश्वर हमारे साथ हैं। ज्ञान कहता है कि वह आकाश की तरह अनंत हैं। प्रेम कहता है कि वह माँ की गोद में मुस्कुराते हुए बालक भी हैं। ज्ञान कहता है कि उन्हें सीमाओं में बाँधा नहीं जा सकता। भक्ति कहती है कि प्रेम के बंधन से बड़ा कोई बंधन नहीं। शायद इसी संतुलन में जीवन की सबसे सुंदर आध्यात्मिक अनुभूति छिपी है। निष्कर्ष: असीम प्रकाश को अपने भीतर अनुभव कीजिएईश्वर को केवल मंदिरों, ग्रंथों या आकाश की असीम ऊँचाइयों में खोजने की आवश्यकता नहीं है। वह असीम हैं, इसलिए हर जगह हैं। और वह प्रेममय हैं, इसलिए हमारे हृदय के भीतर भी हैं। उन्हें केवल असीम मानना पर्याप्त नहीं। उन्हें केवल सीमित रूप में देखना भी पर्याप्त नहीं। सच्ची अनुभूति शायद तब होती है जब हम यह समझते हैं कि— वह असीम हैं, फिर भी मेरे अपने हैं। शायद यही है— असीम प्रकाश।आपसे एक छोटी-सी बातयह लेख मानस प्रवचन के एक छोटे से अंश से प्रेरित होकर लिखा गया है। मैंने इसे अपनी समझ, अनुभूति और भावनाओं के अनुसार “असीम प्रकाश” नाम दिया है। यह लेख मैंने पहली बार 2021 में लिखा था। वर्षों बाद जब इसे फिर से पढ़ा, तो लगा कि कुछ विचार समय के साथ पुराने नहीं होते—बल्कि जीवन के नए अनुभवों के साथ उनका अर्थ और भी गहरा हो जाता है। अगर इस लेख ने आपको भी सोचने, महसूस करने या अपने ईश्वर से जुड़ने के लिए प्रेरित किया हो, तो अपनी अनुभूति कमेंट में जरूर साझा कीजिए। आपके लिए ईश्वर क्या हैं—असीम शक्ति, प्रेम, प्रकाश या कोई अपना? मैं आपके विचार जानना चाहूँगी। ❤️ अगर आपको असीम प्रकाश पसंद आया हो, तो इसे अपने प्रियजनों के साथ साझा करें और Aparichita पर ऐसे ही आध्यात्मिक, भावनात्मक और जीवन से जुड़े लेख पढ़ते रहें। ✍️ Aparichita FAQs1. “असीम प्रकाश” लेख का मुख्य संदेश क्या है?इस लेख का मुख्य संदेश यह है कि ईश्वर या ब्रह्म असीम और निराकार हैं, लेकिन प्रेम और भक्ति के माध्यम से वही असीम शक्ति हमारे जीवन में साकार और अत्यंत निकट अनुभव की जा सकती है। 2. घटाकाश का क्या अर्थ है?घटाकाश का अर्थ घड़े के भीतर दिखाई देने वाला आकाश है। घड़ा आकाश को वास्तव में सीमित नहीं करता, बल्कि केवल हमारी दृष्टि में उसे एक सीमित स्थान के रूप में प्रस्तुत करता है। 3. ज्ञान और भक्ति में क्या अंतर है?ज्ञान हमें ईश्वर की असीमता और व्यापकता का बोध कराता है, जबकि भक्ति उसी असीम ईश्वर के साथ प्रेमपूर्ण और व्यक्तिगत संबंध स्थापित करती है। 4. “दशरथ अजिर बिहारी” का क्या भाव है?इसका भाव यह है कि जो भगवान पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त हैं, वही प्रेम के कारण राजा दशरथ के आँगन में बालक राम के रूप में विहार करते हैं। 5. क्या असीम ब्रह्म वास्तव में सीमित हो जाता है?नहीं। असीम ब्रह्म वास्तव में कभी सीमित नहीं होता। प्रेम और भक्ति के कारण वह भक्त के लिए निकट और साकार रूप में अनुभव होता है। |



