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| कुछ बातें शब्दों से नहीं, आँखों से कही और समझी जाती हैं। |
बिना भाषा के भी एक रिश्ता — उन चूड़ियों की कहानी।
कुछ रिश्ते नाम से नहीं बनते,
कुछ रिश्तों के लिए किसी परिचय की जरूरत नहीं होती।
और कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जहाँ भाषा भी बेबस हो जाती है।
मैं पिछले लगभग डेढ़ महीने से एक PG में रह रही हूँ।
यहाँ रहते हुए कई चेहरे रोज़ दिखाई देते हैं। कोई आता है, कोई चला जाता है। कोई मुस्कुराकर नमस्ते करता है, तो कोई बिना देखे ही अपने काम में लगा रहता है।
लेकिन इन्हीं अनगिनत चेहरों के बीच एक चेहरा ऐसा है, जो धीरे-धीरे मेरे मन का हिस्सा बन गया।
वह एक नवविवाहिता है।
उसकी उम्र देखकर मुझे हमेशा लगता था जैसे वह अभी-अभी अपने बचपन की चौखट से निकलकर इस नई दुनिया में आई हो। चेहरा बिल्कुल कोरे कागज़ जैसा—न कोई बनावट, न कोई दिखावा।
उसकी शादी को अब तक लगभग तीन महीने ही हुए हैं।
जब मैं यहाँ आई थी, तब उसकी शादी को शायद डेढ़ महीने ही हुए होंगे।
मैंने उसे पहली बार देखा तो वह अपने पति के साथ काम कर रही थी। दोनों यहाँ सफाई का काम करते हैं।
वह अपने पति के साथ बहुत खुश दिखाई देती थी।
झाड़ू लगाते हुए भी उसके चेहरे पर उत्साह रहता। पति के साथ-साथ चलना, काम करना, छोटी-छोटी बातों पर मुस्कुराना—उसके भीतर जैसे नई शादी की पूरी चमक समाई हुई थी।
जब वह मेरे कमरे की सफाई करने आती, तो मुस्कुराकर कहती—
“Hi Didi…”
और मैं भी मुस्कुराकर उसका जवाब देती।
हमारी भाषाएँ बिल्कुल अलग थीं।
वह नेपाली बोलती है।
मैं नेपाली का एक शब्द भी ठीक से नहीं समझती।
और मेरी हिंदी या अंग्रेज़ी भी उसके लिए शायद उतनी ही अनजान है।
फिर भी न जाने कैसे…
हमारी छोटी-सी बातचीत हो जाती थी।
कुछ शब्दों से, कुछ इशारों से, कुछ मुस्कुराहटों से।
शायद सच ही कहा गया है—
कुछ बातें शब्दों से नहीं, आँखों से कही और समझी जाती हैं।
फिर उसकी मुस्कान बदलने लगी…
लगभग दो सप्ताह से मैंने उसमें एक बदलाव महसूस किया।
वही चेहरा था।
वही लड़की थी।
वही काम था।
लेकिन उसकी मुस्कान पहले जैसी नहीं थी।
पहले वह काम करते हुए भी खुश दिखाई देती थी। अब जैसे उसके चेहरे पर कोई अनकहा बोझ था।
मैं शायद ज्यादा सोच रही थी…
लेकिन एक दिन मुझे लगा कि वह मुझसे कुछ कहना चाहती है।
वह मेरे पास आई, कुछ बोलने की कोशिश की… फिर रुक गई।
शायद उसे बहुत कुछ कहना था, पर संकोच, डर, झिझक या फिर भाषा। कुछ तो था जो कि उसे रोक दिया। मैं भी अपने दायरे समझते हुए उससे कुछ पूछ नहीं पाई।
और सच कहूँ तो, मैं सचमुच उसकी भाषा को भी नहीं समझ पा रही थी।
कुछ दिन पहले उसने मुझे अपनी आँख के पास चोट के बारे में बताया।
मैंने पूछा—
“कीड़े ने काटा है क्या?”
उसने सिर हिलाकर मना कर दिया।
बस इतना कहा कि चोट लगी है , पर कैसे मालूम नहीं।
अब ये कैसे हो सकता है.... कि, किसी को चोट लगी हो , और उसे मालूम न हो !
कुछ तो था, जो वो बताना भी चाह रही थी , और छुपाना भी।
मैंने उसके चेहरे को देखा।
और न जाने क्यों, मेरा मन उदास हो गया।
मैंने एक और चीज़ नोटिस की…
शायद यह बात बहुत छोटी थी।
लेकिन कभी-कभी छोटी चीज़ें ही बहुत कुछ कह जाती हैं।
उसके हाथों में अब चूड़ियाँ नहीं थीं।
चेहरे पर कोई मेकअप नहीं था।
कानों में भी कुछ नहीं।
मैं यह नहीं कहती कि किसी महिला को खुश रहने के लिए चूड़ियाँ, गहने या मेकअप चाहिए।
बिल्कुल नहीं।
लेकिन जिसकी अभी - अभी शादी हुई हो, हमारे भारत में या हमारी संस्कृति में ऐसा नहीं होता कि उसके हाथ बिलकुल ही सुने हो। मुझे उस लड़की का वही रूप याद था, जब मै उसे पहले-पहले मिली थी।
उसकी आँखों में चमक थी।
उसकी मुस्कान में उत्साह था।
वह अपने छोटे-से संसार को सजाने की कोशिश करती हुई दिखाई देती थी।
और अब…
जैसे उस चमक में थोड़ी कमी आ गई थी।
मैंने मन ही मन उसके पति के बारे में सोचा।
मैं उसे दोष नहीं देना चाहती।
मुझे उसकी जिंदगी के बारे में कुछ पता नहीं है।
शायद उसकी अपनी मजबूरियाँ होंगी।
शायद आर्थिक परेशानियाँ होंगी।
शायद वह अपनी पत्नी की छोटी-छोटी इच्छाओं को समझ ही नहीं पा रहा होगा।
लेकिन एक पत्नी की खुशी के लिए हमेशा सोने की जरूरत तो नहीं होती।
कभी-कभी कुछ सस्ती-सी कृत्रिम चूड़ियाँ भी किसी के चेहरे पर बहुत महँगी मुस्कान ला सकती हैं।
और तो और वो खुद भी काम कर रही है , चाहे छोटा ही सही।
कम से कम कांच की चूड़ियां और सस्ते झुमकों की तो अधिकारी है ही ?
गणपति पंडाल में एक छोटी-सी उम्मीद
कुछ दिन पहले गणेश चतुर्थी के दिन मैंने उसे उसके पति के साथ गणपति पंडाल में देखा।
मुझे ख़ुशी हुई और मेरे मन में अचानक एक विचार आया।
मैंने सोचा—
“शायद आज वह अपनी पत्नी के लिए कुछ खरीदेगा।”
शायद चूड़ियाँ…
शायद कानों की बालियाँ…
शायद कोई छोटी-सी चीज़, जिसे देखकर उसकी पत्नी फिर से वैसे ही मुस्कुरा उठेगी जैसे कुछ सप्ताह पहले मुस्कुराती थी।
लेकिन अगले दिन मैंने उसे वैसे ही देखा। कुछ भी नया नहीं था।
मुझे अच्छा नहीं लगा।
कम से कम आज त्यौहार के दिन तो कुछ दिला ही सकता था।
खैर... मैंने तय किया कि मै ही खरीद लेती हूँ।
बहुत महँगा नहीं, लेकिन उसके सुने हाथों और खाली कानों से तो अच्छा ही होगा !
बस कुछ ऐसी, जो एक नई दुल्हन के हाथों में अच्छी लगे।
मैंने उसके लिए चूड़ियाँ और कानों की बालियाँ खरीद लीं।
आज वह दिन था…
आज जब मैंने उसे चूड़ियां और बालियां दी..., तो मुझे नहीं पता था कि उसकी प्रतिक्रिया क्या होगी।
उसने पैकेट खोला।
चूड़ियाँ और बालियाँ देखीं।
कुछ पल के लिए वह जैसे ठहर गई।
फिर मैंने अपने हाथ से उसे पहना दिया
उसके चेहरे पर अचानक वही पुरानी चमक लौट आई।
वह मुझे देखने लगी।
और फिर…
अचानक उसने मुझे गले लगा लिया।
और कुछ देर वो मुझे वैसे ही गले से लगाईं रही।
हम दोनों की भाषाएँ अलग थीं।
लेकिन उस एक आलिंगन में शायद पूरी कहानी समा गई थी।
मैंने उसकी आँखों में पानी देखा।
लेकिन वे आँसू दुख के नहीं थे।
शायद वे उन आँसुओं में बहुत दिनों बाद मिली खुशी थी।
और उन आँसुओं को देखकर मेरी आँखें भी नम हो गईं।
मुझे वो मेरी बेटी जैसी ही लग रही थी।
वो बहुत कुछ कहना चाह रही थी, पर आज उसकी सारी कहानी उसकी आँखों ने कह दिया था।
और ना ही इस बार, मुझे उसकी कोई बात समझने के लिए किसी भाषा की जरूरत थी।
शायद उसे चूड़ियाँ नहीं, याद किया जाना अच्छा लगा
उस पल मुझे लगा—
शायद उसे उन चूड़ियों की कीमत से कोई मतलब नहीं था।
शायद उसे यह अच्छा लगा कि किसी ने उसे देखा।
किसी ने उसकी मुस्कान में आया फर्क महसूस किया।
किसी ने यह ध्यान दिया कि उसके हाथ खाली हैं।
किसी ने बिना पूछे उसके लिए कुछ करने की कोशिश की।
और शायद सबसे ज्यादा…
उसे यह महसूस हुआ कि वह अकेली नहीं है।
मैं उसके पति और उसके रिश्ते के बारे में कुछ नहीं जानती।
मैं यह भी नहीं जानती कि उसके जीवन में वास्तव में क्या चल रहा है।
इसलिए मैं कोई फैसला नहीं कर सकती।
लेकिन इतना जरूर जानती हूँ कि आज जब उसने मुझे गले लगाया, तब दो ऐसी औरतें एक-दूसरे के सामने खड़ी थीं, जो एक-दूसरे की भाषा नहीं समझती थीं…
फिर भी एक-दूसरे का दर्द शायद समझ गई थीं।
कुछ रिश्ते भाषा से नहीं, एहसास से बनते हैं
हम अक्सर सोचते हैं कि किसी की मदद करने के लिए बहुत कुछ होना चाहिए।
बहुत पैसे चाहिए।
बहुत समय चाहिए।
बड़े-बड़े काम करने चाहिए।
लेकिन शायद हमेशा ऐसा नहीं होता।
कभी-कभी किसी के लिए खरीदी गई कुछ चूड़ियाँ भी बहुत बड़ा उपहार बन जाती हैं।
कभी किसी के कमरे में जाकर मुस्कुराकर पूछ लेना—
“तुम ठीक हो?”
बहुत मायने रखता है।
कभी किसी की आँखों में उदासी देखकर चुपचाप उसके पास बैठ जाना ही काफी होता है।
और कभी-कभी…
एक छोटी-सी चूड़ी की खनक किसी के भीतर बुझती हुई खुशी को फिर से जगा देती है।
आज मेरी और उस नेपाली लड़की की कोई लंबी बातचीत नहीं हुई।
हमने एक-दूसरे की भाषा में कोई बड़ी बात नहीं कही।
लेकिन आज मुझे लगा—
हमने एक-दूसरे से बहुत कुछ कह दिया।
उसने अपनी आँखों के आँसुओं से।
और मैंने उन छोटी-सी चूड़ियों से।
शायद यही इंसानियत की सबसे सुंदर भाषा है—
जिसे बोलना नहीं पड़ता,
सिर्फ महसूस करना पड़ता है।
आख़िर में…
मैं नहीं जानती कि कल वह फिर पहले जैसी मुस्कुराएगी या नहीं।
मैं नहीं जानती कि उसके जीवन में क्या चल रहा है।
मैं बस इतना चाहती हूँ कि उसकी वह मासूम मुस्कान बनी रहे।
उसके हाथों में चूड़ियाँ खनकती रहें।
और उसके जीवन में वह खुशी बनी रहे, जिसे आज कुछ पल के लिए उसकी आँखों में वापस आते मैंने देखा।
क्योंकि आज मुझे एक बात बहुत गहराई से समझ आई—
किसी के जीवन में बड़ा बदलाव लाने के लिए हमेशा बड़ा काम करना जरूरी नहीं होता।
कभी-कभी…
बस किसी के खाली हाथों को देखकर उन्हें चूड़ियों से भर देना भी काफी होता है।
और शायद…
किसी अजनबी के चेहरे पर लौट आई मुस्कान, हमारे अपने मन को भी थोड़ा और इंसान बना देती है।
