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| कुछ रिवाज़ शरीर को नहीं, आत्मा को कैद कर देते हैं। |
रिवाजो के नाम पर, जिन्दों को दफनाते देखा है।
Blog Introduction
कभी-कभी किसी व्यक्ति की मृत्यु केवल एक जीवन नहीं छीनती, बल्कि उसके साथ किसी और के जीने का अधिकार भी समाज छीन लेता है।
आज भी हमारे समाज में कुछ ऐसी परम्पराएँ और सोच मौजूद हैं, जो विशेषकर विधवा स्त्रियों के जीवन को रंगहीन बना देती हैं। उनसे मुस्कुराने का अधिकार, त्योहारों में शामिल होने की खुशी, और अपने मन से जीवन जीने की स्वतंत्रता तक छीन ली जाती है।
यह कविता किसी एक स्त्री की कहानी नहीं है।
यह उन अनगिनत महिलाओं की आवाज़ है, जिन्हें समाज ने जीवित रहते हुए भी सामाजिक कैद में धकेल दिया।
कभी-कभी किसी व्यक्ति की मृत्यु केवल एक जीवन नहीं छीनती, बल्कि उसके साथ किसी और के जीने का अधिकार भी समाज छीन लेता है।
आज भी हमारे समाज में कुछ ऐसी परम्पराएँ और सोच मौजूद हैं, जो विशेषकर विधवा स्त्रियों के जीवन को रंगहीन बना देती हैं। उनसे मुस्कुराने का अधिकार, त्योहारों में शामिल होने की खुशी, और अपने मन से जीवन जीने की स्वतंत्रता तक छीन ली जाती है।
यह कविता किसी एक स्त्री की कहानी नहीं है।
यह उन अनगिनत महिलाओं की आवाज़ है, जिन्हें समाज ने जीवित रहते हुए भी सामाजिक कैद में धकेल दिया।
कविता
रिवाज़ों के नाम पर
रिवाज़ों के नाम पर
यहाँ इंसानों की बस्ती में,
इंसानों को ही
इंसानों की बोटियाँ नोचते देखा है।
रिवाज़ों के नाम पर,
ज़िन्दों को दफ़नाते देखा है।
कहते हैं...
मृत्यु के बाद सब समाप्त हो जाता है।
पर मैंने देखा है—
कुछ लोग मरकर भी नहीं मरते,
और कुछ...
ज़िन्दा होकर भी जी नहीं पाते।
क्या कम है
ज़िंदा लाश बनने के लिए
कि छिन गया उसका जीवनसाथी?
फिर भी रिवायतों के नाम पर,
उसकी हर साँस पर,
हर मुस्कान पर,
हर कदम पर...
अपने ही अपनों को
पहरा लगाते देखा है।
रिवाज़ों के नाम पर,
ज़िन्दों को दफ़नाते देखा है।
प्रीतम के जाने से
मन की बगिया पहले ही उजड़ चुकी थी।
लेकिन...
उस बंजर धरती पर भी
पत्थरों और रेत की परतें बिछाते
अपने ही रहनुमाओं को देखा है।
हूक भरती धड़कनों पर भी
परहेज़ों के क़सीदे पढ़ते,
मरहम की जगह
ज़ख्म कुरेदते...
अपने ही ख़ैरख़्वाहों को देखा है।
रिवाज़ों के नाम पर,
ज़िन्दों को दफ़नाते देखा है।
कहते हैं—
सफ़ेद वस्त्र पहन लेने से
दर्द भी सफ़ेद हो जाता है।
काश...
इतना आसान होता।
ख़ुशी के रंग
अब शायद कभी न लौटें,
पर प्रकृति के रंगों से भी
उसे दूर करते...
अपने ही दर्दमंदों को देखा है।
जी तो शायद
अब कभी न सकेगी...
पर साँस लेने की इजाज़त
तो दो उसे भी।
उसके होंठों की हँसी छीन ली,
उसकी आँखों के सपने छीन लिए,
उसकी चूड़ियाँ,
उसकी बिंदी,
उसकी पहचान तक छीन ली...
अब और क्या लोगे उससे?
वह अधमरी ही सही...
ज़िन्दा तो है अभी।
यह कैसी परम्परा है,
जो इंसान से उसकी इंसानियत छीन ले?
यह कैसा रिवाज़ है,
जो साँस लेते हुए शरीर को
कब्र बना दे?
यहाँ इंसानों की बस्ती में...
इंसानों को ही
इंसानों की बोटियाँ नोचते देखा है।
**रिवाज़ों के नाम पर,
ज़िन्दों को दफ़नाते देखा है।
हाँ...
रिवाज़ों के नाम पर,
ज़िन्दों को दफ़नाते देखा है।**
मेरे विचार (Author's Thoughts)
यह कविता किसी धर्म, जाति या परम्परा के विरुद्ध नहीं है।
यह केवल उन रूढ़ियों पर प्रश्न उठाती है, जो किसी व्यक्ति की मानवता, सम्मान और जीने के अधिकार को छीन लेती हैं।
हर परम्परा तब तक सुंदर है, जब तक वह प्रेम, सम्मान और सह-अस्तित्व सिखाती है।
लेकिन जब कोई रिवाज़ किसी जीवित इंसान को ही जीने से रोकने लगे, तब उस पर प्रश्न करना आवश्यक हो जाता है।
समाज बदलता है।
समय बदलता है।
तो हमारी सोच भी बदलनी चाहिए।
क्योंकि—
दर्द का कोई धर्म नहीं होता।
आँसुओं की कोई जाति नहीं होती।
और
जीने का अधिकार हर इंसान का होता है।
एक कड़वा प्रश्न...
इतिहास और भारतीय संस्कृति से जुड़ा एक प्रश्न, जिसका उत्तर शायद हम सबको अपने भीतर खोजने की आवश्यकता है।
जो स्त्रियाँ अपने सुहाग पर गर्व करते हुए किसी विधवा स्त्री को हीन समझती हैं, उससे दूरी बनाती हैं, या उसके सामने स्वयं को श्रेष्ठ मानती हैं—
क्या उनका स्थान भारतीय इतिहास और संस्कृति की उन महान नारियों से भी ऊँचा है, जिन्होंने विधवा होने के बाद भी अपने धैर्य, त्याग, ज्ञान और मातृत्व से युगों को दिशा दी?
क्या हम भूल गए हैं कि...
माता कौशल्या ने महाराज दशरथ के पश्चात अपना जीवन गरिमा के साथ जिया।
माता कुंती ने पांडु के निधन के बाद पाँचों पांडवों का पालन-पोषण कर धर्म की रक्षा की।
माता सत्यवती ने हस्तिनापुर के कठिन समय में राजवंश का भार संभाला।
माता मंदोदरी ने रावण के पश्चात भी अपने विवेक, मर्यादा और धैर्य का परिचय दिया।
यदि इन महान नारियों का सम्मान उनके वैवाहिक दर्जे से नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व, चरित्र और कर्मों से किया जाता है—
तो आज एक विधवा स्त्री का सम्मान उसके सुहाग के आधार पर क्यों आँका जाता है?
क्या किसी स्त्री का सम्मान उसके माथे के सिंदूर से तय होगा, या उसके चरित्र, संवेदनाओं और मानवता से?
कुछ प्रश्न हमारे समाज से
- क्या किसी व्यक्ति की पहचान केवल उसके जीवनसाथी से होती है?
- क्या दुःख का अर्थ जीवनभर की सज़ा है?
- क्या परम्पराएँ इंसान के लिए हैं, या इंसान परम्पराओं के लिए?
- क्या किसी स्त्री की मुस्कान उसके पति के साथ ही समाप्त हो जानी चाहिए?
- क्या संवेदनाएँ भी रिवाज़ों की मोहताज हैं?
निष्कर्ष
शायद समय आ गया है कि हम परम्पराओं को तोड़ें नहीं, बल्कि उन्हें समझें और आवश्यक हो तो उन्हें मानवीय बनाएँ।
हर इंसान को जीने का अधिकार है।
किसी के दुःख को और गहरा करना संस्कृति नहीं हो सकती।
यदि हमारी संवेदनाएँ जीवित हैं, तो समाज भी जीवित रहेगा।
Quote Box (Highlight)
"सबसे क्रूर मृत्यु वह नहीं, जब साँसें रुक जाएँ।
सबसे क्रूर मृत्यु वह है, जब समाज किसी जीवित व्यक्ति से जीने का अधिकार छीन ले।"
Call to Action
यदि इस कविता ने आपके मन को छुआ है, तो इसे केवल पढ़कर आगे न बढ़ें।
इसे अपने परिवार और मित्रों के साथ साझा करें। शायद एक संवेदनशील विचार किसी का जीवन बदल दे।
यदि आपके मन में भी ऐसी कोई अनुभूति या अनुभव है, तो नीचे टिप्पणी में अवश्य लिखें। आपकी आवाज़ भी किसी के लिए उम्मीद बन सकती है।

रिवाज़ो के नाम पर हूक भरती सांसो को छीनने का प्रयाश।
ReplyDeleteबहुत सही लिखा है शिखा जी, कुछ रिवाजें ऐसी हैं जो जीते जी मारती रहती हैं। सांसों पर तो बस नहीं बस मर मर के जीने पर मजबूर।
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