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| “ज़ुस्तज़ू तो बस इतनी-सी थी… ख़यालों में ही सही, तुम्हारे पहलू में कुछ वक़्त हम भी बिताते।” |
तुम्हारे पहलू में — अधूरे लम्हों और अनकहे एहसासों की एक खूबसूरत कविता
ज़ुस्तज़ू तो बस इतनी-सी थी… ख़यालों में ही सही,
तुम्हारे पहलू में कुछ वक़्त हम भी बिताते।
कभी-कभी ज़िंदगी हमसे बहुत कुछ नहीं माँगती।
न कोई वादा, न कोई मंज़िल, न हमेशा साथ रहने की ज़िद।
बस किसी अपने के पास बैठकर कुछ पल गुज़ार लेने की इच्छा होती है।
कुछ बातें कहने की, कुछ बातें सुनने की…
कुछ अधूरे किस्से पूरे करने की…
और शायद बिना कुछ कहे भी एक-दूसरे को समझ लेने की।
“तुम्हारे पहलू में” ऐसी ही एक छोटी-सी ख्वाहिश की कविता है—जहाँ दूरी है, यादें हैं, बीता हुआ वक़्त है और उन लम्हों की तलाश है जो शायद कभी मिले ही नहीं।
तुम्हारे पहलू में
ज़ुस्तज़ू तो बस इतनी-सी थी, ख़यालों में ही सही,
तुम्हारे पहलू में कुछ वक़्त हम भी बिताते।
रख के सर वक़्त की आग़ोश में,
उन अनमोल लम्हों का लुत्फ़ हम भी उठाते।
कर लेते कुछ हाल-ए-दिल अपना-अपना,
कुछ तुम सुनाते, कुछ मेरी सुन लेते,
सारी आधी-अधूरी बातें,
मिलकर पूरी कर लेते।
ज़ुस्तज़ू तो बस इतनी-सी थी, ख़यालों में ही सही,
तुम्हारे पहलू में कुछ वक़्त हम भी बिताते।
दूर होकर भी हमारे एहसास थे क़रीब,
जैसे साँसों का धड़कनों से हो राब्ता।
ये भी वक़्त ही था—
मेरे बिन अधूरा था तेरा हर ख़्वाब।
और ये भी वक़्त की ही बात है कि
हम भी वहीं, तुम भी वहीं,
दरमियाँ दूरियाँ भी वहीं।
अब कुछ नहीं है तो,
बस तुम्हारा वो वक़्त नहीं है।
ज़ुस्तज़ू तो बस इतनी-सी थी, ख़यालों में ही सही,
तुम्हारे पहलू में कुछ वक़्त हम भी बिताते।
इस कविता के पीछे छिपा एहसास
किसी रिश्ते में सबसे बड़ी कमी हमेशा प्यार की नहीं होती।
कभी-कभी कमी सिर्फ़ वक़्त की होती है।
इंसान सामने होता है, फिर भी उसके पास बैठने का वक़्त नहीं होता।
बातें दिल में होती हैं, मगर उन्हें कहने का मौका नहीं मिलता।
और फिर धीरे-धीरे वही बातें यादों का हिस्सा बन जाती हैं।
इस कविता में भी चाहत बहुत बड़ी नहीं है।
बस इतनी-सी चाहत है कि—
कुछ पल साथ मिल जाते,
कुछ अनकही बातें कह दी जातीं,
और कुछ अधूरे ख़्वाब पूरे होने का एहसास दे जाते।
“हम भी वहीं, तुम भी वहीं…” — दूरी का सबसे ख़ामोश रूप
कविता की ये पंक्तियाँ शायद सबसे ज्यादा कुछ कहती हैं—
“हम भी वहीं, तुम भी वहीं,
दरमियाँ दूरियाँ भी वहीं।”
कभी-कभी दूरी किलोमीटरों में नहीं होती।
दो लोग एक ही शहर में होते हैं।
एक-दूसरे को याद भी करते हैं।
शायद एक-दूसरे के बारे में सोचते भी हैं।
फिर भी उनके बीच एक ऐसी दूरी आ जाती है जिसे कोई नक्शा नहीं बता सकता।
वह दूरी होती है—वक़्त की।
और शायद इसी वजह से कविता की आखिरी पंक्ति इतनी चुभती है—
“अब कुछ नहीं है तो,
बस तुम्हारा वो वक़्त नहीं है।”
कुछ रिश्ते अधूरे होकर भी पूरे क्यों लगते हैं?
हर रिश्ता किसी मुकाम तक पहुँचे, यह ज़रूरी नहीं।
कुछ रिश्ते हमारे जीवन में बस कुछ एहसास छोड़ जाते हैं।
कुछ लोग हमेशा हमारे साथ नहीं रहते, लेकिन उनकी यादें हमारे भीतर लंबे समय तक रहती हैं।
कभी किसी गीत में,
कभी किसी ख़ुशबू में,
कभी किसी शाम की ख़ामोशी में,
और कभी किसी पुरानी बात में…
अचानक वही इंसान फिर से याद आ जाता है।
शायद रिश्तों की खूबसूरती यही है—
हर कहानी का पूरा होना ज़रूरी नहीं होता।
कुछ कहानियाँ अधूरी रहकर भी दिल में पूरी जगह बना लेती हैं।
क्या आपको भी कभी किसी के लिए ऐसी ही ज़ुस्तज़ू हुई है?
कभी ऐसा हुआ है कि आप किसी से सिर्फ़ कुछ पल बात करना चाहते थे?
न कोई शिकायत,
न कोई सवाल,
न कोई उम्मीद…
बस उसके पास बैठकर कहना चाहते थे—
“थोड़ी देर और ठहर जाओ।”
अगर हाँ, तो शायद यह कविता आपके अपने किसी अधूरे एहसास की भी कहानी हो सकती है।
निष्कर्ष
ज़िंदगी में बहुत कुछ हमारे हाथ में नहीं होता।
कौन हमारे साथ रहेगा,
कौन दूर चला जाएगा,
कौन हमें समझेगा और कौन नहीं—इन सबका फैसला हम नहीं कर सकते।
लेकिन कुछ लम्हे ऐसे होते हैं जिन्हें हम उम्र भर अपने भीतर सँजोकर रखते हैं।
और कभी-कभी हमारी पूरी ज़ुस्तज़ू बस इतनी-सी होती है—
ख़यालों में ही सही,
किसी अपने के पहलू में
कुछ वक़्त हम भी बिताते।
आपकी राय
अगर “तुम्हारे पहलू में” कविता ने आपके दिल में किसी पुराने एहसास को छुआ हो, तो नीचे टिप्पणी में बताइए—
क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा इंसान है, जिसके साथ आप सिर्फ़ कुछ पल और बिताना चाहते थे?
ऐसी ही भावनात्मक कविताओं, जीवन के अनकहे एहसासों और दिल को छू जाने वाली कहानियों के लिए Aparichita से जुड़े रहिए। ❤️
