शाम की आगोश में अक्सर, तन्हाइयों का बोलबाला है।
![]() |
| शाम की आगोश में अक्सर, तन्हाइयों का बोलबाला है। |
शाम की आगोश में अक्सर, तन्हाइयों का बोलबाला है।
टिमटिमाते तारो के पीछे, आकाश अंधेरे साए में खोने बाला है।
ज़्यादातर मुस्काते मुखरो के दिल में ,
अस्मशान की ज्योत जगाए जाने बाला है।
शाम की आगोश में अक्सर, तन्हाइयों का बोलबाला है।
हाल जो पूछो, कैसे हो?
एक ही जबाब आने बाला है,
हाँ, ठीक है, बस इसी शब्दो का बोलबाला है।
उस ठीक में , कितनी बेचैनी, कितना दर्द छुपा है,
ये तो बस वही जानने बाला है।
शाम की आगोश में अक्सर तन्हाइयों का बोलबाला है।
बस भागते जाने बाले यूँ खुशी की खोज में,
रुको एक पल ! सोचो जरा, क्यूँ है इतना होर पड़ा ?
जो बाहर ढूंढ रहा, तेरे ही भीतर है भरा पड़ा।
खुशियां खरीदी जा नही सकती, किसी भी बाज़ार में,
ये तो है , तेरे ही भीतर सजा हुआ सा मिलने बाला।
शाम की आगोश में अक्सर, तन्हाइयों का है बोलबाला ।
✍️Upeksha❣️
इस भाग-दौड़ की जिंदगी में, सबने जितने ही कमरे भर रखे हैं, उनका दिल उतना ही सुना पड़ा है, और उसको भरने के लिए भाग-भाग कर विचारों से भी खाली होते जा रहे है ।
उम्मीद है पसंद आएगी, कृपया सुझाव अवश्य दे।
धन्यवाद।
