ये इश्क़ की गलियाँ: बदलते शहर में बचपन की धुंधली यादें

ये इश्क़ की गलियाँ और बचपन की पुरानी यादें
कुछ गलियाँ बदल जाती हैं, लेकिन उनसे जुड़ी यादें कभी नहीं बदलतीं।

ये इश्क़ की गलियाँ: बदलते शहर में बचपन की धुंधली यादें

कभी-कभी हम किसी अनजान रास्ते से गुजरते हैं और अचानक लगता है—अरे, यह जगह तो कुछ जानी-पहचानी सी है।

कोई पेड़ दिखाई देता है, किसी पुराने घर की दीवार दिखती है, किसी बुज़ुर्ग की आँखों में एक जाना-पहचाना अपनापन नजर आता है और वर्षों पुरानी यादें अचानक हमारे सामने आ खड़ी होती हैं।

शायद जगह वही नहीं होती।

लेकिन यादें अपनी जगह नहीं बदलतीं।

यह कविता भी ऐसी ही एक वापसी है—उन गलियों में, जहाँ कभी बचपन खेला था, पेड़ों की छाँव थी, आँगन में आवाज़ें थीं और रिश्तों में अपनापन था।

आज वही गलियाँ ऊँची इमारतों में बदल गई हैं।

पेड़ कट गए हैं।

खिड़कियाँ बंद हैं।

बच्चों के खेल बदल गए हैं।

और कुछ पुराने चेहरे अब समय की धूल में ढँके हुए लगते हैं।

फिर भी मन कहता है—

“ये इश्क़ की गलियाँ,
थोड़ी पहचानी सी लगती हैं...”

ये इश्क़ की गलियाँ...

ये इश्क़ की गलियाँ,
थोड़ी पहचानी सी लगती हैं।
हम भी गुज़रे हैं कभी... उधर से,
यादें धुँधली परछाईं सी लगती हैं।

हो न हो...
बहार के कुछ तो फूल बचे होंगे,
लाख पतझड़ ने दस्तक दी हो,
या हिम ने कहर बरपाया हो।

वृक्ष न सही,
जड़ें तो हरी होंगी।

शायद उन्हीं जड़ों में
हमारे बचपन की कोई कहानी अब भी बाकी होगी,
शायद किसी सूखे पत्ते के नीचे
हमारी कोई हँसी दबकर पड़ी होगी।

ये इश्क़ की गलियाँ,
थोड़ी पहचानी सी लगती हैं।
हम भी गुज़रे हैं कभी... उधर से,
यादें धुँधली परछाईं सी लगती हैं।

दस-बारह घरों का वह छोटा-सा मोहल्ला

हाँ, यही तो था...

दस-बारह घरों का एक छोटा-सा मोहल्ला,
उस मोहल्ले में पीपल, बरगद और अम्बिया की छइयाँ।

उन छइयों के नीचे
बचपन की अठखेलियाँ,
दोपहर की शरारतें,
शाम की आवाज़ें
और बेफिक्र हँसती हुई गलियाँ।

किसी के घर से आती खाने की खुशबू,
कहीं से माँ की आवाज़,
कहीं बच्चों की चीख-पुकार,
और कहीं किसी काकी की डाँट...

सब कुछ जैसे कल की ही बात हो।

पीपल और बरगद तो काट दिए गए,
उनकी जगह खड़ी हैं
ऊँची-ऊँची महलियाँ।

पेड़ों की छाँव चली गई,
लेकिन उनकी यादें
अब भी मन के किसी कोने में खड़ी हैं।

ये इश्क़ की गलियाँ,
थोड़ी पहचानी सी लगती हैं।
हम भी गुज़रे हैं कभी... उधर से,
यादें धुँधली परछाईं सी लगती हैं।

ऊँची इमारतें, बंद दरवाज़े और बदलता बचपन

ऊँची महलियों के
बंद दरवाज़े हैं,
बंद हैं खिड़कियाँ।

न वह शोर है,
न वे अठखेलियाँ।

हर घर में
अपने-अपने कमरों में बंद बच्चे हैं,
और उन बच्चों के
ग़ज़ब के खिलौने।

क्रिकेट, कबड्डी
तो हुई कल की बातें...

आज तो मोबाइल की स्क्रीन
हर दिल पर छाई है।

मैदान छोटे नहीं हुए,


बस बच्चों की दुनिया छोटी हो गई है।

जहाँ कभी शाम होते ही
बच्चे घर से बाहर निकल आते थे,
आज वहीं कई बच्चे
एक कमरे में बैठे
एक आभासी दुनिया में खेलते हैं।

समय बदला है।

खेल बदले हैं।

घर बदले हैं।

शायद हम भी बदल गए हैं।

ये इश्क़ की गलियाँ,
थोड़ी पहचानी सी लगती हैं।
हम भी गुज़रे हैं कभी... उधर से,
यादें धुँधली परछाईं सी लगती हैं।

काकी... क्या आप भी मुझे पहचानती हैं?

आगे बढ़ी तो काकी दिखाई दीं।

उनकी आँखें
धुँधली-सी, पुरानी-सी लगती हैं।

थोड़ी पहचानी,
थोड़ी अनमनी-सी लगती हैं।

हर घर की चीज़ों की तरह
वो भी पुरानी सी लगती हैं।

कभी देखा था उन्हें
सतरंगी साड़ी में,
बलखाती लंबी ज़ुल्फ़ों के संग।

तब उनके गुजरने भर से
मोहल्ले के काकाओं के
धड़कते दिलों में
हलचल मच जाती थी।

आज वही काकी
समय की सिलवटों में
कुछ खोई-सी बैठी हैं।

चेहरा वही है,
बस उम्र ने उस पर
अपनी कहानी लिख दी है।

मैं उन्हें देखती हूँ...

और सोचती हूँ—

क्या उन्हें भी मेरी तरह
पुराना मोहल्ला याद आता होगा?

क्या उन्हें भी
वह पीपल याद आता होगा?

वह बरगद?

वह अम्बिया की छाँव?

वह बचपन?

या फिर यादों ने
उनकी आँखों में भी
मेरी तरह धुँधला होना सीख लिया है?

ये इश्क़ की गलियाँ,
थोड़ी पहचानी सी लगती हैं।
हम भी गुज़रे हैं कभी... उधर से,
यादें धुँधली परछाईं सी लगती हैं।

कुछ गलियाँ कभी पुरानी नहीं होतीं

शहर बदलते हैं।

घर बदलते हैं।

पेड़ कट जाते हैं।

नई इमारतें खड़ी हो जाती हैं।

बच्चों के खेल बदल जाते हैं।

लोग बूढ़े हो जाते हैं।

लेकिन कुछ गलियाँ
हमारे भीतर हमेशा वैसी ही रहती हैं।

वहाँ अब भी
पीपल की छाँव होती है।

बरगद की जड़ें होती हैं।

अम्बिया की खुशबू होती है।

बच्चों की हँसी होती है।

और किसी कोने में
हमारा बचपन नंगे पाँव दौड़ रहा होता है।

शायद इसलिए
जब हम वर्षों बाद उन गलियों से गुजरते हैं,
तो रास्ते हमें पहचानें या न पहचानें...

हम उन रास्तों को पहचान लेते हैं।

क्योंकि वे रास्ते
सिर्फ मिट्टी और पत्थरों से नहीं बने होते।

वे बने होते हैं—

हमारी यादों से।

ये इश्क़ की गलियाँ,
थोड़ी पहचानी सी लगती हैं।
हम भी गुज़रे हैं कभी... उधर से,
यादें धुँधली परछाईं सी लगती हैं।

और शायद...

बहार के कुछ फूल
अब भी कहीं बचे होंगे।

लाख पतझड़ ने दस्तक दी हो,
लाख समय ने अपना कहर बरपाया हो...

वृक्ष भले न रहे हों,
जड़ें तो अब भी हरी होंगी।

क्योंकि कुछ यादें
कभी पूरी तरह सूखती नहीं।

वे बस
हमारे भीतर
एक मौसम का इंतज़ार करती रहती हैं।

फिर किसी दिन,
किसी अनजानी-सी जानी-पहचानी गली में
हमें रोककर कहती हैं—

“देखो...
तुम यहाँ कभी रहा करते थे।”

निष्कर्ष

“ये इश्क़ की गलियाँ” मेरे लिए केवल प्रेम की गलियों की कहानी नहीं है। यह उन गलियों की कहानी है जहाँ हमने बचपन, रिश्ते, पेड़, हँसी और अपना एक छोटा-सा संसार छोड़ा था।

समय बहुत कुछ बदल देता है, लेकिन हमारी स्मृतियों के पास अपना एक अलग संसार होता है।

शायद इसी वजह से कुछ जगहों पर लौटकर हम जगह को नहीं, अपने पुराने रूप को खोजते हैं।

और जब वह नहीं मिलता, तो मन धीरे से कहता है—

ये इश्क़ की गलियाँ,
थोड़ी पहचानी सी लगती हैं...

पाठकों से एक सवाल

क्या आपके जीवन में भी ऐसी कोई गली, मोहल्ला या जगह है जहाँ लौटकर आपको अपना बचपन याद आ जाता है?

नीचे कमेंट में अपनी याद जरूर साझा करें। शायद आपकी एक छोटी-सी याद किसी और के बचपन का दरवाज़ा भी खोल दे।

Frequently Asked Questions (FAQs)

1. “ये इश्क़ की गलियाँ” कविता किस बारे में है?
यह कविता बदलते मोहल्ले, खोते बचपन, कटते पेड़ों, बदलती जीवनशैली और पुरानी यादों के बारे में है। इसमें प्रेम के साथ-साथ समय और स्मृतियों का भाव भी है।

2. इस कविता में इश्क़ का अर्थ क्या है?
यहाँ इश्क़ केवल किसी व्यक्ति से प्रेम नहीं है। यह अपने बचपन, अपने मोहल्ले, पेड़ों, लोगों और उन बीते हुए दिनों से लगाव का प्रतीक है।

3. कविता में पीपल और बरगद का क्या महत्व है?
पीपल और बरगद पुराने समय, प्रकृति, सामुदायिक जीवन और बचपन की यादों के प्रतीक हैं। इनके कट जाने से बदलते समय और खोती हुई पुरानी दुनिया का एहसास होता है।

4. “वृक्ष न सही, जड़ें तो हरी होंगी” का क्या अर्थ है?
इस पंक्ति में उम्मीद छिपी है। भले ही पुरानी दुनिया दिखाई न दे, लेकिन उसकी जड़ें—यादें, संस्कार और भावनाएँ—अब भी हमारे भीतर जीवित रह सकती हैं।

5. क्या यह कविता केवल प्रेम कविता है?
नहीं। यह प्रेम, nostalgia, बचपन, बदलते समाज, प्रकृति और समय—इन सभी भावों को एक साथ छूती है।

अगर आपको यह कविता पसंद आई...

अगर इस कविता ने आपको आपके बचपन की किसी गली, पुराने घर, पेड़ या किसी अपने की याद दिलाई हो, तो इसे अपने किसी ऐसे दोस्त के साथ साझा करें जो आज भी अपने पुराने दिनों को दिल में सँजोकर रखता है।

क्योंकि कुछ गलियाँ पीछे छूट जाती हैं,
लेकिन उनसे जुड़ी यादें कभी पीछे नहीं छूटतीं।

— Aparichita






Shikha Bhardwaj

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