आ ज़िंदगी, मैं बस कर लूँ तुमसे मुलाक़ात | हिंदी कविता

कुछ रिश्ते, कुछ मुस्कानें और कुछ अधूरी ख्वाहिशें

आ ज़िंदगी, मैं बस कर लूँ तुमसे मुलाक़ात — एक भावुक हिंदी कविता

कभी-कभी दूसरों को खुश रखते-रखते हम खुद से ही दूर हो जाते हैं। फिर एक रात ऐसी आती है, जब हम दुनिया के शोर से दूर बैठकर अपनी ज़िंदगी से कुछ सवाल करना चाहते हैं।

कुछ ऐसी ही भावनाओं से जन्मी यह कविता मैंने 2021 में लिखी थी। उस समय मन में न जाने कितने सवाल थे, कितनी अधूरी ख्वाहिशें थीं और कितने ऐसे अनुभव थे, जिनका हिसाब शायद ज़िंदगी से ही माँगना था।

आज जब मैं इस कविता को दोबारा पढ़ती हूँ, तो महसूस होता है कि समय भले ही बदल जाए, लेकिन कुछ एहसास हमारे भीतर हमेशा ज़िंदा रहते हैं।

यह कविता उन सभी लोगों के नाम है, जिन्होंने कभी दूसरों को पाने की चाह में खुद को खोया है, बेवजह मुस्कुराए हैं और फिर किसी ख़ामोश रात में अपनी ज़िंदगी से मिलने की इच्छा की है।

आ ज़िंदगी, मैं बस कर लूँ तुमसे मुलाक़ात

तुझे पाने की चाह में,

कतरा-कतरा तुझे ही
खोती जा रही हूँ, ऐ ज़िंदगी!

उधार के लोग, ख़रीदी हुई मुस्कान,
पर आज बस तेरे नाम।

मैं, तुम और ये रात,
और मुझे मेरी ज़िंदगी से मुलाक़ात।

कितना तुमसे मिली,
और कितना बेवजह ही ख़र्च किया।

कुछ वो लोग भी, जो नाक़ाबिल थे,
ज़िंदगी से मिले बनकर गर्दिश-ए-हालात।

कुछ हिसाब उनका भी,
कुछ सीख उनसे भी।

आ ज़िंदगी,
करूँ मैं तुमसे खुलकर बात।

न चाँद, न चाँदनी,
न ही तारों की बारात।

बस मैं, तुम और ये निशा की रात।

बस इत्मीनान हो,
न शोर, न पाबंदियों का बोझ।

कतरा-कतरा जितना खोया,
आज बस उन सबका कर लूँ हिसाब।

आ ज़िंदगी,
मैं बस कर लूँ तुमसे मुलाक़ात ।

ज़िंदगी से कुछ सवाल

कभी आपने सोचा है कि दूसरों की उम्मीदों पर खरा उतरने की कोशिश में हमने खुद से कितनी दूरियाँ बना ली हैं?

कितनी बार हम मुस्कुराए, जबकि मन कहीं और उलझा हुआ था? कितनी बार ऐसे रिश्तों को निभाते रहे, जिनमें हमारे अपने एहसासों के लिए जगह ही नहीं थी?

ज़िंदगी में कुछ लोग हमें खुशियाँ देते हैं, कुछ खूबसूरत यादें और कुछ ऐसे अनुभव, जिन्हें हम चाहकर भी भुला नहीं पाते। मगर हर अनुभव अपने साथ कोई न कोई सीख छोड़ जाता है।

शायद इसीलिए मैं अपनी कविता में ज़िंदगी से हिसाब माँगना चाहती हूँ। शिकायतों का हिसाब नहीं, बल्कि उन पलों का हिसाब, जिनमें मैंने खुद को खोया और उन अनुभवों का भी, जिन्होंने मुझे अपने बारे में कुछ नया सिखाया।

कुछ रिश्ते, कुछ मुस्कानें और कुछ अधूरी ख्वाहिशें

ज़िंदगी की राह में हम न जाने कितने लोगों से मिलते हैं। कुछ हमारे सफ़र का हिस्सा बन जाते हैं, कुछ बीच रास्ते में छूट जाते हैं और कुछ हमें ऐसी सीख दे जाते हैं, जिसकी कीमत समय बीतने के बाद समझ आती है।

हर मुस्कान खुशी की निशानी नहीं होती। कभी-कभी हम सिर्फ़ इसलिए मुस्कुराते हैं, ताकि कोई हमारी उदासी को पढ़ न सके।

और हर मुलाक़ात का मतलब किसी को पा लेना भी नहीं होता। कभी-कभी किसी से मिलकर हम अपने भीतर छिपे उस इंसान को पहचानते हैं, जिसे हम दुनिया की भागदौड़ में कहीं पीछे छोड़ आए थे।

मेरे लिए यह कविता उन्हीं अनकहे एहसासों की आवाज़ है।

एक रात, सिर्फ़ मैं और मेरी ज़िंदगी

कल्पना कीजिए एक ऐसी रात की, जब कोई शोर न हो, कोई शिकायत न हो और किसी को कुछ साबित करने की मजबूरी भी न हो।

न चाँद से कोई शिकायत, न तारों से कोई उम्मीद। बस एक शांत रात, थोड़ा-सा सुकून और खुद से खुलकर बात करने का अवसर।

उस रात हम अपनी अधूरी इच्छाओं को याद कर सकते हैं, अपनी गलतियों को स्वीकार कर सकते हैं और उन लोगों को भी मन ही मन विदा कर सकते हैं, जिन्हें हमने बहुत समय तक अपने भीतर जगह दे रखी थी।

शायद ज़िंदगी से मुलाक़ात का अर्थ यही है—अपने बीते कल को समझना, आज को महसूस करना और आने वाले कल के लिए अपने मन में थोड़ी-सी जगह बनाना।

अंत में — एक मुलाक़ात खुद से भी

हम अक्सर ज़िंदगी में बहुत कुछ पाने की कोशिश करते हैं। बेहतर रिश्ते, अपनों का साथ, खुशियाँ और अपने सपनों को पूरा करने का अवसर।

लेकिन इस सफ़र में एक मुलाक़ात अक्सर अधूरी रह जाती है—खुद से मुलाक़ात।

कभी-कभी रुकना भी ज़रूरी होता है। पीछे मुड़कर देखना, अपने अनुभवों को समझना और खुद से पूछना कि हम सच में क्या चाहते हैं।

आज मेरी यही इच्छा है कि ज़िंदगी से एक ऐसी मुलाक़ात हो, जिसमें कोई दिखावा न हो, कोई बंधन न हो और कोई जल्दबाज़ी न हो।

बस कुछ सवाल हों, कुछ जवाब हों और थोड़ा-सा सुकून।

आ ज़िंदगी, मैं बस कर लूँ तुमसे मुलाक़ात।

आपसे एक सवाल

क्या कभी आपको भी ऐसा लगा है कि दूसरों को खुश रखने की कोशिश में आप खुद से दूर हो गए हैं?

अगर हाँ, तो अपने एहसास मेरे साथ साझा कीजिए। हो सकता है, आपकी कहानी किसी दूसरे दिल को भी अपने मन की बात कहने का साहस दे।

अगर यह कविता आपके दिल को छू गई हो, तो इसे उन लोगों के साथ साझा कीजिए, जिन्हें कभी-कभी खुद से मिलने की ज़रूरत महसूस होती है।

— आपकी अपनी, अपरिचिता


Shikha Bhardwaj

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1 Comments

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  1. बहुत खूब अंदाज़ निराला है कविता का,खुशी हुई मुझे आप अच्छी कविता लिखतीं है

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