ये जो ठोकर लगी… | हौसलों, संघर्ष और नई उड़ान की कविता

ये जो ठोकर लगी – संघर्ष और हौसले पर आधारित हिंदी कविता
ठोकर और संघर्ष के बाद फिर उठने के हौसले पर लिखी भावपूर्ण हिंदी कविता—“ये जो ठोकर लगी…”


ये जो ठोकर लगी… | हौसलों, संघर्ष और नई उड़ान की कविता

कुछ ठोकरें हमें गिराने के लिए नहीं, बल्कि यह बताने के लिए आती हैं कि हमें अब किस दिशा में उठना है।

जुलाई 2021 में लिखी गई यह कविता मेरे लिए सिर्फ़ शब्दों का संग्रह नहीं है। इसके पीछे उस समय के कुछ भाव, कुछ उलझनें, कुछ रिश्ते, कुछ सवाल और सबसे बढ़कर—खुद को फिर से संभालने की कोशिश छिपी है।

ज़िंदगी में कभी-कभी ऐसा समय आता है जब हम लड़खड़ा जाते हैं। पुराने ख़याल पीछे छूट जाते हैं, कुछ रिश्तों की परछाइयाँ बदल जाती हैं और भविष्य को लेकर मन में कई सवाल उठने लगते हैं।

लेकिन शायद वहीं से एक नई उड़ान की शुरुआत भी होती है।

ये जो ठोकर लगी…

— जुलाई 2021

ये जो ठोकर लगी…
लड़खड़ाई हूँ मैं,
मेरे भटके हुए ख़यालों की
एक दुनिया थी,
जो अब पीछे छूट गई है।

अब जो सामने खड़ा है,
वो है—
एक ऊँची उड़ान,
और हौसलों से भरा
मेरा मुक़द्दर।

डर है…
कहीं सुन न लें
मेरी दरो-दीवारें।

इनके पास
सबक भी बहुत हैं,
और सुझाव भी।

मगर वक़्त के थपेड़ों से मिले ज़ख़्मों पर
मरहम तो
मुझे ख़ुद ही बनाना होगा।

उसे खरीद लूँ
किसी बाज़ार से—
ऐसा कोई बाज़ार नहीं है।

अपनों की कमी नहीं,
हर रिश्ते से
भरपूर हूँ मैं।

लेकिन जो कभी
मेरा साया था,
वही अँधेरे में
साथ छोड़ चला।

अब जो मेरे साथ है,
सिर्फ़ मेरे हौसले हैं।

मुझे ही ठीक करने होंगे
अपने बिगड़े मुक़द्दर,
मुझे ही सँवारने होंगे
ज़िंदगी के बिखरे हुए पन्ने।

देखना है…
प्रभु के और कितने
उपकार हैं मेरे हिस्से में।

वो देगा
उलझनों से आज़ादी,
या फिर लेगा
कुछ और इम्तिहान मेरे।

जो भी करे…
बस इतनी-सी दुआ है—

मेरे हौसलों की
बरक़त बनाए रखे।

क्योंकि गिरना
मेरे हाथ में नहीं था,
लेकिन…

गिरकर फिर उठना
मेरे हौसलों के हाथ में है।

ठोकरें हमेशा अंत नहीं होतीं

हम अक्सर ठोकर को हार समझ लेते हैं।

जब कोई योजना असफल होती है, कोई रिश्ता बदल जाता है, कोई अपना दूर चला जाता है या जीवन हमारी उम्मीद के अनुसार नहीं चलता, तो लगता है कि सब कुछ बिखर गया है।

लेकिन समय के साथ समझ आता है कि हर ठोकर अपने साथ कोई न कोई सबक लेकर आती है।

कुछ ठोकरें हमें लोगों को समझना सिखाती हैं।

कुछ हमें अपने बारे में बताती हैं।

और कुछ हमें यह एहसास कराती हैं कि जिस सहारे को हम अपनी ताक़त समझ रहे थे, शायद हमारी असली ताक़त कहीं और थी।

हमारे अपने भीतर।

जब अपना साया भी साथ छोड़ जाए

कविता की इन पंक्तियों में शायद सबसे अधिक अकेलापन महसूस होता है—

“लेकिन जो कभी
मेरा साया था,
वही अँधेरे में
साथ छोड़ चला।”

ज़िंदगी में रिश्ते बहुत होते हैं। हमारे आसपास अपने लोग होते हैं। फिर भी कभी-कभी मन के किसी कोने में एक ऐसी कमी रह जाती है जिसे कोई दूसरा रिश्ता पूरा नहीं कर पाता।

किसी एक व्यक्ति की मौजूदगी हमारे जीवन में इतनी महत्वपूर्ण हो सकती है कि उसके दूर जाने के बाद भी उसकी अनुपस्थिति हमारे आसपास बनी रहती है।

लेकिन जीवन वहीं रुक नहीं जाता।

कभी-कभी हमें अपने ही टूटे हुए हिस्सों को जोड़ना पड़ता है।

अपने ज़ख़्मों का मरहम खुद बनाना

कविता में मैंने लिखा था—

“वक़्त के थपेड़ों से मिले ज़ख़्मों पर
मरहम तो मुझे ख़ुद ही बनाना होगा।”

शायद जीवन का यह सबसे कठिन पाठ है।

दूसरे हमें सलाह दे सकते हैं।
कोई हमारा हाथ पकड़ सकता है।
कोई हमारे आँसू पोंछ सकता है।

लेकिन भीतर से ठीक होने की यात्रा हमें स्वयं करनी पड़ती है।

इसका कोई बाज़ार नहीं है जहाँ से हम साहस, शांति या आत्मविश्वास खरीद सकें।

ये धीरे-धीरे बनते हैं—
अनुभवों से,
समय से,
प्रार्थना से,
और सबसे अधिक
अपने भीतर के हौसले से।

रिश्ते बहुत हैं, फिर भी एक खालीपन क्यों?

कविता में एक विरोधाभास भी है—

“अपनों की कमी नहीं,
हर रिश्ते से भरपूर हूँ मैं।”

फिर भी एक साया चला गया।

यह विरोधाभास जीवन की सच्चाई का एक हिस्सा है।

हमारे पास बहुत से रिश्ते हो सकते हैं, लेकिन हर रिश्ता अपनी जगह अलग होता है।

किसी की जगह कोई दूसरा नहीं ले सकता।

इसलिए किसी की कमी महसूस करना हमेशा यह साबित नहीं करता कि हमारे पास अपने लोग नहीं हैं।

कभी-कभी इसका अर्थ सिर्फ़ इतना होता है कि कोई रिश्ता हमारे जीवन में बहुत गहरा था।

अब साथ हैं मेरे हौसले

जब बाहरी सहारे कम हो जाते हैं, तब भीतर की आवाज़ सुनाई देने लगती है।

“अब जो मेरे साथ है,
सिर्फ़ मेरे हौसले हैं।”

शायद यही इस कविता का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ है।

पहले कविता ठोकर से शुरू होती है।

फिर अकेलेपन से गुजरती है।

और अंत में हौसले तक पहुँचती है।

यही जीवन भी है।

हमेशा कोई हमारे साथ नहीं चल सकता।

कभी-कभी रास्ता हमें अकेले तय करना पड़ता है।

और तब हमें अपने भीतर से ही कहना पड़ता है—

मैं संभाल लूँगी।

प्रभु से सिर्फ़ एक प्रार्थना

कविता के अंतिम हिस्से में सवाल है—

प्रभु आगे क्या देंगे?

उलझनों से आज़ादी?

या कुछ और इम्तिहान?

हम भविष्य नहीं जानते।

हम यह भी नहीं जानते कि आने वाले दिनों में हमारे हिस्से में क्या लिखा है।

लेकिन शायद प्रार्थना का अर्थ हर कठिनाई को हटाने की माँग करना नहीं है।

कभी-कभी प्रार्थना बस इतनी होती है—

“जो भी हो, मेरे हौसले मत छीनना।”

क्योंकि अगर हौसला बचा रहे, तो इंसान कठिन रास्तों पर भी आगे बढ़ सकता है।

पाँच साल बाद भी ये कविता क्यों याद है?

मैंने यह कविता जुलाई 2021 में लिखी थी।

आज जब मैं इसे वर्षों बाद पढ़ती हूँ, तो महसूस होता है कि उस समय लिखे गए कुछ शब्द समय के साथ और अर्थपूर्ण हो गए हैं।

शायद यही कविता की खूबसूरती है।

हम किसी कविता को एक समय में लिखते हैं, लेकिन उसका अर्थ हमेशा उसी समय तक सीमित नहीं रहता।

समय बदलता है।

हम बदलते हैं।

हमारे अनुभव बदलते हैं।

और फिर वही कविता किसी दूसरे दिन हमें अपने जीवन का एक नया अर्थ दिखा देती है।

निष्कर्ष: ठोकर के बाद एक नई उड़ान

ज़िंदगी में ठोकर लगना हमारे हाथ में नहीं होता।

कभी परिस्थितियाँ हमें गिराती हैं, कभी रिश्ते, कभी हमारे अपने फैसले और कभी समय।

लेकिन गिरने के बाद उठने की कोशिश हमारे हाथ में होती है।

शायद हर इंसान की कहानी में कोई न कोई ऐसा अध्याय होता है जहाँ उसे अपने टूटे हुए हिस्सों को खुद समेटना पड़ता है।

और शायद वहीं से उसकी नई उड़ान शुरू होती है।

मेरी इस पुरानी कविता को पढ़ने के बाद अगर आपको भी अपने जीवन की कोई ठोकर याद आई हो, तो उसे सिर्फ़ अपनी कमजोरी मत समझिए।

हो सकता है…

वही ठोकर आपकी अगली उड़ान की शुरुआत हो।

एक छोटी-सी बात आपसे

क्या आपके जीवन में भी कभी ऐसी ठोकर आई है जिसने आपको भीतर से बदल दिया?

अगर हाँ, तो अपने अनुभव को शब्द देने की कोशिश कीजिए।

कभी-कभी लिखना भी
खुद को ठीक करने की एक छोटी-सी शुरुआत होता है।


FAQs

1. “ये जो ठोकर लगी…” कविता किस बारे में है?

यह कविता जीवन की ठोकरों, संघर्ष, रिश्तों में आए बदलाव, अकेलेपन, आत्मविश्वास और फिर से आगे बढ़ने के हौसले के बारे में है।

2. यह कविता कब लिखी गई थी?

“ये जो ठोकर लगी…” जुलाई 2021 में लिखी गई थी।

3. कविता का मुख्य संदेश क्या है?

कविता का मुख्य संदेश यह है कि जीवन में ठोकर और कठिनाइयाँ आ सकती हैं, लेकिन हमें अपने हौसले को बनाए रखते हुए आगे बढ़ने की कोशिश करनी चाहिए।

4. क्या यह एक प्रेरणादायक हिंदी कविता है?

हाँ। इसमें संघर्ष और भावनात्मक पीड़ा के साथ-साथ आत्मविश्वास, उम्मीद, प्रार्थना और नई शुरुआत का भाव है।

5. “मेरे हौसलों की बरक़त बनाए रखे” का क्या अर्थ है?

इसका भाव है कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, ईश्वर व्यक्ति के भीतर साहस, विश्वास और आगे बढ़ने की शक्ति बनाए रखें।

आपके लिए एक पंक्ति

“हर ठोकर रास्ते का अंत नहीं होती; कुछ ठोकरें हमें हमारी नई उड़ान का रास्ता दिखाती हैं।”

अगर आपको यह कविता पसंद आई, तो Aparichita पर मेरी दूसरी हिंदी कविताएँ और जीवन से जुड़ी भावपूर्ण रचनाएँ भी पढ़िए।


✍️Aparichita


 


 

Shikha Bhardwaj

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