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| कुछ रातें नींद नहीं लातीं… वे हमारे पास बैठकर हमारी खामोशी सुनती हैं। |
आँखों के बरामदे बैठी रात | एक रात, तन्हाई और अधूरी बातों की कविता
🌙 आँखों के बरामदे बैठी रात
कुछ रातें सिर्फ रात नहीं होतीं।
वे चुपचाप हमारी पलकों की चिलमन उठाती हैं, आँखों के बरामदे में आकर बैठ जाती हैं और फिर जाने क्यों… हमें सोने नहीं देतीं।
शायद उन्हें भी किसी से बातें करनी होती हैं।
शायद उनके पास भी कुछ अनकहे दर्द होते हैं।
और शायद… कुछ दर्द ऐसे होते हैं जिन्हें दुनिया नहीं, सिर्फ एक खामोश रात ही समझ सकती है।
आज ऐसी ही एक रात मेरे आँखों के बरामदे में आ बैठी है।
ये रात भी न…
ये रात भी न, पलकों के चिलमन को उठा,
आँखों के बरामदे बैठ गई है।
बोलती है, नींदों की पहरेदारी करेगी।
शांत सन्नाटे में खोया ये जहाँ,
और खोई मैं।
पर ये रात आँखों के बरामदे बैठ गई है,
कहती है, मुझसे बातें करेगी।
“चाँदनी आई नहीं,
गुफ़्तगू इसकी हुई नहीं,
तो ये मुझे अपना हर दर्द बताएगी।
इसलिए मेरे आँखों के बरामदे,
नींद की पहरेदारी करेगी।”
बोली भी,
जा झींगुर संग लाड लड़ा,
नहीं...,
ये तो मुझे ही हर मर्ज बताएगी।
कहती है, झींगुर झुंड में है,
हर कोई किसी के संग में है।
कहाँ मेरा मर्म समझ पाएगी वो,
जो तू समझ पाएगी।
इसलिए मेरे आँखों के बरामदे,
नींद की पहरेदारी करेगी।
जब रात ने ठान ली है, कहाँ मानेगी!
मैने भी अब हार मान ली है,
रात तू सुना ही डाल,
हथियार मैने भी अब डाल दी है।
क्योंकि रात मेरे आंखों के बरामदे,
नींद की पहरेदारी करेगी।
चाँदनी आज आई नहीं।
शायद बादलों के पीछे कहीं ठहर गई है।
उससे आज गुफ़्तगू भी नहीं हुई।
तो रात ने सोचा होगा—
क्यों न आज अपना ही कोई दर्द सुनाया जाए?
वह मेरे पास बैठी रही।
बिना किसी शिकायत के।
बिना किसी सवाल के।
बस… मेरी आँखों में झाँकती रही।
और फिर बोली—
“चाँदनी आई नहीं,
गुफ़्तगू इसकी हुई नहीं,
तो ये मुझे अपना हर दर्द बताएगी।
इसलिए मेरे आँखों के बरामदे,
नींद की पहरेदारी करेगी।”
रात और झींगुरों की बातें
मैंने उसे बहलाने की कोशिश की।
कहा—
“जा, झींगुर संग लाड़ लड़ा…”
लेकिन रात भी कहाँ मानने वाली थी।
वह जैसे आज अपना मन खोलकर ही बैठी थी।
बोली—
“नहीं, ये तो मुझे ही हर मर्ज़ बताएगी।”
फिर उसने बाहर झाँका।
झींगुरों की आवाज़ें सन्नाटे को चीर रही थीं।
वह बोली—
“कहती है, झींगुर झुंड में हैं,
हर कोई किसी के संग में है।
कहाँ मेरा मर्म समझ पाएगी वो,
जो तू समझ पाएगी।”
मैं चुप रही।
क्योंकि उसकी बात में शायद मेरी ही कहानी छिपी थी।
दुनिया में भीड़ बहुत है।
लोग बहुत हैं।
रिश्ते बहुत हैं।
लेकिन हर भीड़ के बीच एक ऐसा कोना जरूर होता है, जहाँ इंसान सिर्फ अपने साथ होता है।
और शायद उस कोने की खामोशी को वही समझ सकता है, जो खुद कभी वहाँ बैठा हो।
इसलिए—
मेरे आँखों के बरामदे,
नींद की पहरेदारी करेगी।
जब रात ने हार नहीं मानी
जब रात ने ठान ही लिया है कि आज सोने नहीं देगी…
तो कहाँ मानेगी!
मैंने भी आखिर हार मान ली।
कहा—
“रात, तू सुना ही डाल,
हथियार मैंने भी अब डाल दी है।”
अब न नींद से कोई शिकायत है,
न रात से कोई नाराज़गी।
आज रात और मैं…
दोनों आमने-सामने बैठे हैं।
वह अपना दर्द सुनाएगी।
मैं अपना।
शायद इसी बहाने कुछ बोझ हल्का हो जाए।
शायद सुबह तक आँखों में थोड़ी नींद उतर आए।
या फिर…
शायद रात के साथ हुई यह लंबी गुफ़्तगू ही मेरी नींद बन जाए।
क्योंकि—
रात मेरे आँखों के बरामदे,
नींद की पहरेदारी करेगी।
कुछ रातें याद रह जाती हैं
हम अक्सर सोचते हैं कि हमें नींद क्यों नहीं आती।
लेकिन शायद हर बार वजह नींद का न आना नहीं होती।
कभी-कभी मन बहुत कुछ कहना चाहता है।
कुछ पुराने सवाल होते हैं।
कुछ अधूरे जवाब।
कुछ यादें।
कुछ रिश्ते।
कुछ लोग।
और कुछ ऐसी बातें…
जिन्हें हम दिन के उजाले में खुद से भी नहीं कह पाते।
फिर रात आती है।
सन्नाटा चारों ओर फैल जाता है।
और हम अपने ही भीतर की आवाज़ सुनने लगते हैं।
शायद इसीलिए कुछ रातें काटनी नहीं पड़तीं…
उनके साथ बैठना पड़ता है।
निष्कर्ष
उस रात मैंने जाना—
हर रात नींद चुराने नहीं आती।
कुछ रातें हमारी खामोशी सुनने आती हैं।
कुछ रातें हमारे भीतर छिपे दर्द को शब्द देने आती हैं।
और कुछ रातें…
बस हमारे आँखों के बरामदे बैठकर कहती हैं—
“सो मत अभी…
आज थोड़ी बातें कर लेते हैं।”
❓ FAQ
1. “आँखों के बरामदे बैठी रात” कविता किस बारे में है?
यह कविता तन्हाई, अनकही बातों, रात के सन्नाटे और अपने भीतर छिपे भावों से संवाद करने के बारे में है।
2. कविता में “आँखों का बरामदा” क्या दर्शाता है?
“आँखों का बरामदा” एक काव्यात्मक कल्पना है, जहाँ रात आकर बैठती है और इंसान के मन की खामोशी को सुनती है।
3. रात को कविता में इंसान की तरह क्यों प्रस्तुत किया गया है?
कविता में रात को मानवीय रूप देकर उसे एक हमराज़ की तरह दिखाया गया है—जो बिना सवाल किए हमारे दर्द को सुन सकती है।
4. क्या यह तन्हाई पर आधारित कविता है?
हाँ। कविता में तन्हाई है, लेकिन यह केवल दुख की तन्हाई नहीं है। इसमें आत्म-संवाद और अपनी भावनाओं को स्वीकार करने का भाव भी है।
📌 Call to Action
अगर कभी कोई रात आपकी आँखों में भी आकर बैठ जाए और नींद की पहरेदारी करने लगे, तो उससे भागिए मत।
शायद वह भी आपसे कुछ कहना चाहती हो।
आपको यह कविता कैसी लगी?
क्या कभी आपके साथ भी ऐसा हुआ है कि रात भर नींद नहीं आई और खामोशी आपकी सबसे अच्छी साथी बन गई?
अपनी बात कमेंट में जरूर लिखिए। ❤️
— Aparichita
