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| कुछ रिश्ते अधूरे होकर भी पूरी ज़िन्दगी में लिखे रहते हैं। |
ज़िन्दगी की किताब: रिश्ता, तेरे और मेरे मन का | हिंदी कविता
कुछ रिश्ते अधूरे होकर भी पूरी ज़िन्दगी में लिखे रहते हैं…
कभी-कभी ज़िन्दगी में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं, जिन्हें कोई नाम देना आसान नहीं होता। न उन्हें पूरी तरह अपना कह सकते हैं, न उनसे पूरी तरह दूर जा सकते हैं। कुछ बातें होंठों तक आकर ठहर जाती हैं, कुछ यादें मन के किसी कोने में हमेशा के लिए बस जाती हैं, और कुछ सवाल उम्र भर जवाब का इंतज़ार करते रहते हैं।
क्या आपने भी कभी किसी ऐसे रिश्ते को महसूस किया है, जो आपके जीवन में होकर भी अधूरा रह गया?
आज Aparichita पर प्रस्तुत हैं मेरी दो हिंदी कविताएँ—“रिश्ता, तेरे और मेरे मन का” और “ज़िन्दगी की किताब”।
ये कविताएँ मैंने वर्ष 2021 में लिखी थीं। आज जब उन्हें दोबारा पढ़ती हूँ, तो लगता है कि समय बीत जाता है, लेकिन कुछ एहसास अपनी जगह पर ही ठहरे रहते हैं।
आइए, शब्दों के सहारे उन अनकहे एहसासों को महसूस करते हैं।
1. रिश्ता, तेरे और मेरे मन का
रिश्ता, तेरे और मेरे मन का,
दिन और रात-सा है जैसे।
कभी मुकम्मल मिलना नहीं,
कभी जुदा होना भी नहीं।
रिश्ता, तेरे और मेरे मन का,
नदी के दो किनारों-सा है जैसे।
तुझसे बात बनती नहीं,
तुझ बिन कोई बात होती नहीं।
कितना अजीब है न,
ये रिश्ता तेरे और मेरे मन का—
न कोई नाम, न कोई मंज़िल,
फिर भी जाने क्यों
हर रास्ता तुझ तक जाता है।
और क्या कहें भला!
दरमियाँ जब ख़ामोशियाँ घर कर लेती हैं,
उनका शोर फिर सारा शहर सुनता है।
ज़ुबाँ ख़ामोश रहती है,
आँखें जाने क्या-क्या कह जाती हैं,
और हम हैं कि
एक-दूसरे के सामने होकर भी
एक-दूसरे तक पहुँच नहीं पाते।
रिश्ता, तेरे और मेरे मन का—
न पूरी तरह अपना,
न पूरी तरह पराया।
बस एक एहसास है,
जो मिटता भी नहीं
और मुकम्मल होता भी नहीं।
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इस कविता के पीछे का एहसास
कुछ रिश्ते हमारी ज़िन्दगी में किसी स्पष्ट पहचान के बिना भी गहरी जगह बना लेते हैं। उनके बीच दूरियाँ होती हैं, कभी संवाद की कमी होती है, तो कभी ख़ामोशी ही सबसे बड़ी बातचीत बन जाती है।
नदी के दो किनारों की तरह, दो लोग एक-दूसरे के सामने होकर भी हमेशा साथ नहीं चल सकते। फिर भी उनके बीच बहती भावनाओं की नदी उन्हें किसी अदृश्य डोर से जोड़े रखती है।
शायद कुछ रिश्तों की खूबसूरती उनके मुकम्मल होने में नहीं, बल्कि उस एहसास में होती है जो अधूरा रहकर भी कभी समाप्त नहीं होता।
2. ज़िन्दगी की किताब
तुम्हारी यादों के सहारे
ज़िन्दगी की पूरी किताब लिखना चाहती हूँ।
उसके हर पन्ने पर
कुछ ख़्वाब होंगे, कुछ अधूरे क़िस्से,
कुछ हँसी के पल, कुछ नम आँखें,
और कुछ ऐसे लफ़्ज़
जिन्हें कभी कह नहीं पाई।
तुम वो किताब पढ़ने आओगे न?
वक़्त-बेवक़्त,
किसी इशारे में ही सही,
मेरी ज़िन्दगी पर छाई धुंध हटाओगे न?
हक़ीक़त में नहीं,
तो ख़्वाबों में ही सही,
कभी फ़ुर्सत से
उस किताब के पन्ने पलटने आओगे न?
ज़रा ठहरकर पढ़ना उसे,
जल्दी में बंद मत कर देना।
मामूली नहीं है ये किताब,
इसमें पूरी ज़िन्दगी दर्ज़ है मेरी।
कुछ पन्ने तुम्हारे नाम के हैं,
कुछ उन लम्हों के
जो तुम्हारे साथ जीए थे,
और कुछ उन ख़ाली जगहों के
जिन्हें तुम्हारे जाने के बाद
कोई भर नहीं पाया।
पढ़ना तो इत्मीनान से,
हर शब्द को महसूस करते हुए,
हर ख़ामोशी का मतलब समझते हुए।
क्योंकि कुछ बातें
स्याही से नहीं लिखी जातीं,
वे आँखों में ठहरती हैं,
और उम्र भर पढ़े जाने का
इंतज़ार करती हैं।
जाने किस बात की हड़बड़ी थी तुम्हें,
कि किताब खुली छोड़कर चले गए।
कुछ शब्द उलझे रह गए,
कुछ सवाल अधूरे,
कुछ ख़्वाब अपनी बारी की राह देखते रहे।
अब तुम ही बताओ,
उन उलझे हुए शब्दों को
कौन सुलझाएगा?
कभी लौटकर
उनका अर्थ समझाओगे न?
सांत्वना के दो शब्द ही सही,
मेरे हिस्से की ख़ामोशी सुनने आओगे न?
तुम बिन आसान नहीं
ज़िन्दगी की हर डोर सुलझाना,
कुछ गाँठें वक़्त भी नहीं खोल पाता,
कुछ दर्द किसी से कहे नहीं जाते।
फिर भी लिख रही हूँ
अपनी ज़िन्दगी के बिखरे हुए क़िस्से,
एक-एक पन्ना जोड़कर,
एक-एक याद समेटकर।
बस एक आख़िरी सवाल है तुमसे—
जब कभी वक़्त मिले तुम्हें,
जब कभी मेरी याद आए,
जब कभी किसी अधूरे क़िस्से को
पूरा पढ़ने का मन करे—
तो मेरी ज़िन्दगी की किताब
पढ़ने आओगे न?
— ज़िन्दगी की किताब, अभी अधूरी है…



Very beautiful
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