मैं सब हारती ही गई।

मैं सब हारती ही गई।

एक कविता, एक अपरिचिता से परिचित एहसास।

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मैं सब हारती ही गई।

हार और जीत के इस खेल में,
ख़ुद को तुमसे हराकर, तुमको ही हारती गई।
तुम जीतकर ख़ुश हुए, मैं तुमसे हारकर ख़ुश हुई।
तुम खुद में खुश रहे,तुम्हारी खुशी से मैं खुश हुई।
हार और जीत के इस खेल में न जाने,
 मैं सब हारती ही गई और तुमको जीताती गई।

 तुम्हारी ख्वाहिशों में मेरे निशाँ तक न थे,
तुम्हारे सिवा मेरी कोई ख़्वाहिश न रही।
तुम्हारी आहट ही मेरी तपिश बनी रही
जिसे तुम कभी समझ भी न सके,
और मै फ़ना होती गई।
हार और जीत के इस खेल में न जाने कैसे,
मै सब हारती ही गई, तुमको जिताती ही गई।

दिल और दिमाग के बीच का संग्राम जारी रहा,
दिमाग हारता गया और दिल जीतता गया।
तुम्हारी बाते फूल में लिपटे काँटे सी होती गई
जो कशिश कम और कशक ज्यादा देती गई।
हार और जीत के इस खेल में न जाने कैसे,
मैं सब हारती गई, और तुमको जिताती गई।

सब जानते हुए भी हमेशा की तरह, तुम जीतते गए
और तुम्हारी एक मुस्कुराहट पर मै सब हारती गई।
हार गई उन लम्हो को, 
उस  क्षण को, जो सिर्फ हमारे लिए था।
मैं थी, तुम थे और हमारे ख्वाब थे,
जो अब अधूरे ही रहेंगें।

हार और जीत के इस खेल मे,
जो बातें सीखी, बस इतनी है,
कभी किसी के लिए हारना नही,
और खुद से ज़्यादा किसी पर मरना नही


"मैं सब हारती ही गई।" अपरिचिता से परिचय के सफर में एक पन्ना, कुछ ख्यालों, कुछ बातों और कुछ एहसासों का।
आपके विचारों और सुझावों के लिए आपेक्षित। 

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