Aparichita
Thoughts • Stories • Inner Reflections
हर पतझड़ के बाद
हर अँधेरे के पीछे छिपा होता है एक नया सवेरा
कभी-कभी जीवन ऐसा लगता है मानो दुःख का यह दौर कभी समाप्त ही नहीं होगा।
समय रुक-सा जाता है, मन थक जाता है, और उम्मीदें धीरे-धीरे धुंधली होने लगती हैं।
लेकिन प्रकृति हर बार हमें एक गहरा सत्य सिखाती है —
कुछ भी स्थायी नहीं होता।
न सुख…
न दुःख…
न पतझड़…
और न ही अँधेरा।
हर बीतती शाम के बाद जैसे सवेरा आता है,
वैसे ही हर कठिन समय के बाद जीवन फिर से मुस्कुराना सीखता है।
कविता
ये पल भी गुज़रकर कल होगा
ये पल भी गुज़रकर कल होगा,
सच कहते हैं —
जैसे सुख बीते हैं जीवन में,
दुःख का भी अन्तिम पल होगा।
रख इख़्तियार ख़ुद पर और ख़ुदा पर,
जैसे बसर हुआ हर दुःख अब तक,
वैसे ही ये भी गुज़र होगा।
रख इख़्तियार ख़ुद पर और ख़ुदा पर।
माना कि घोर अँधेरा है,
पर समय का पहिया कब रुकता है?
हर शाम के बाद सवेरा,
यही दुनिया का रेला है।
देखो, प्रकृति ने भी
यही खेल सदा खेला है —
हर पतझड़ के बाद
वसंत का ही मेला है।
अब सोचो, किसका मोल बड़ा —
वसंत का उल्लास
या पतझड़ की उदासी का?
आनन्द चुनोगे या अवसाद?
विपदाओं को गिनते रहोगे,
या रेशमी किरणों को समेट
इस रौशन जग में कर्म करोगे?
आनन्द चुनोगे या अवसाद?
कविता का भाव
यह कविता केवल आशा की बात नहीं करती,
बल्कि जीवन के उस चुनाव की बात करती है जो हर व्यक्ति रोज़ करता है —
क्या हम अपने दुःखों को गिनते रहेंगे,
या छोटी-छोटी रोशनियों को समेटकर आगे बढ़ेंगे?
पतझड़ और वसंत केवल मौसम नहीं हैं,
वे हमारे मन की अवस्थाएँ भी हैं।
जीवन में कठिन समय आएँगे,
लेकिन वही समय हमें मज़बूत भी बनाते हैं।
और शायद इसी कारण, वसंत का सौन्दर्य इतना अनमोल लगता है।
अंतिम शब्द
यदि इस समय आपका जीवन भी किसी अँधेरे दौर से गुजर रहा है,
तो बस इतना याद रखिए —
समय कभी ठहरता नहीं।
और हर पतझड़ के बाद,
वसंत सचमुच लौटता है।
About the Author
I Shikha writes on Aparichita to explore life, emotions, spirituality, and quiet reflections of the soul. My words often come from small moments of life — a silent evening, a sky full of stars,
or a thought that refuses to stay unspoken.
हर पतझड़ के बाद
हर अँधेरे के पीछे छिपा होता है एक नया सवेरा
कभी-कभी जीवन ऐसा लगता है मानो दुःख का यह दौर कभी समाप्त ही नहीं होगा।
समय रुक-सा जाता है, मन थक जाता है, और उम्मीदें धीरे-धीरे धुंधली होने लगती हैं।
लेकिन प्रकृति हर बार हमें एक गहरा सत्य सिखाती है —
कुछ भी स्थायी नहीं होता।
न सुख…
न दुःख…
न पतझड़…
और न ही अँधेरा।
हर बीतती शाम के बाद जैसे सवेरा आता है,
वैसे ही हर कठिन समय के बाद जीवन फिर से मुस्कुराना सीखता है।
कविता
ये पल भी गुज़रकर कल होगा
ये पल भी गुज़रकर कल होगा,
सच कहते हैं —
जैसे सुख बीते हैं जीवन में,
दुःख का भी अन्तिम पल होगा।रख इख़्तियार ख़ुद पर और ख़ुदा पर,
जैसे बसर हुआ हर दुःख अब तक,
वैसे ही ये भी गुज़र होगा।
रख इख़्तियार ख़ुद पर और ख़ुदा पर।माना कि घोर अँधेरा है,
पर समय का पहिया कब रुकता है?
हर शाम के बाद सवेरा,
यही दुनिया का रेला है।देखो, प्रकृति ने भी
यही खेल सदा खेला है —
हर पतझड़ के बाद
वसंत का ही मेला है।
अब सोचो, किसका मोल बड़ा —
वसंत का उल्लास
या पतझड़ की उदासी का?
आनन्द चुनोगे या अवसाद?
विपदाओं को गिनते रहोगे,
या रेशमी किरणों को समेट
इस रौशन जग में कर्म करोगे?
आनन्द चुनोगे या अवसाद?
कविता का भाव
यह कविता केवल आशा की बात नहीं करती,
बल्कि जीवन के उस चुनाव की बात करती है जो हर व्यक्ति रोज़ करता है —
क्या हम अपने दुःखों को गिनते रहेंगे,
या छोटी-छोटी रोशनियों को समेटकर आगे बढ़ेंगे?
पतझड़ और वसंत केवल मौसम नहीं हैं,
वे हमारे मन की अवस्थाएँ भी हैं।
जीवन में कठिन समय आएँगे,
लेकिन वही समय हमें मज़बूत भी बनाते हैं।
और शायद इसी कारण, वसंत का सौन्दर्य इतना अनमोल लगता है।
अंतिम शब्द
यदि इस समय आपका जीवन भी किसी अँधेरे दौर से गुजर रहा है,
तो बस इतना याद रखिए —
समय कभी ठहरता नहीं।
और हर पतझड़ के बाद,
वसंत सचमुच लौटता है।
About the Author
I Shikha writes on Aparichita to explore life, emotions, spirituality, and quiet reflections of the soul. My words often come from small moments of life — a silent evening, a sky full of stars, or a thought that refuses to stay unspoken.
