सावित्री

इस बार छुट्टीयों में माँ के घर गई, जहां मेरी मुलाकात एक माँ से हुई।"माँ" लगभग हर औरत एक रश्म और उम्र के बाद माँ बनती ही है।फिर सभी को आश्चर्य होगा कि मैंने यहां "माँ" शब्द क्यों संबोधित किया है।ठीक है, हर माँ महान होती है और अपने बच्चों के लिए ही जीती है।लेकिन इनकी कहानी थोड़ी अलग है।

हुआ यूं कि माँ के घर एक नई काम वाली आना शुरू की है।हाँ हमारे घर मे भले ही उन्हें दीदी या आंटी कहकर संबोधित करते हैं लेकिन समाज के लिए वो एक काम वाली ही है।मेरी माँ उनके बारे में बता रही थी कि बेचारी बड़ी दुखिया है,नही तो क्या ऊँची जाती होने पर भी लोगो के जूठे बर्तन धोती!

उनका नाम है "सावित्री",नाम के तरह ही एकदम सीधी -सादी और लगनशील।कुछ साल पहले ही उनके पति की असमय मृत्यु हो गई थी। ऐक बेटा है, लेकिन ऐसा बेटा भगवान दुश्मन को भी न दे।कहते हैं कि दो लोगो के बीच प्यार भगवान का आशीर्वाद होता है लेकिन आजकल का ये कैसा प्यार है जो न तो पालन-पोषण का दायित्व उठाते है, और न ही शादी के लिए ही तैयार होते हैं लेकिन शारिरिक भूख ही शर्वोपरि हो जाता  है। जो भी हो,उसे किसी लड़की से प्यार हो गया और वो लड़की गर्भवति भी हो गई।ज़ाहिर सी बात है कि गर प्यार था तो सहमति दोनों की ही होगी।गर्भवति हो जाने के बाद प्यार का ख़ुमार भी जल्दी ही उतर गया।लड़की वाले ने लड़के की ख़ूब धुनाई की और लड़का शहर छोर कर भाग गया।लड़की एक बच्ची की माँ है अब।

अब कहानी शुरू होती है शावित्री की जिसके पति का देहान्त हो गया है, खुद के आमदनी का कोई जरिया नही, बेटा भी अवारा ही निकला । उपर से जिस बच्ची का जन्म उसके बेटे और उस लड़की के करतूतों का नतीजा है, उसमें भी बेचारी इस सावित्री का ही दोष है, क्योंकि बेटा तो आख़िर उसी का है, इसलिए उस बच्ची के भरण पोषण का भार भी सावित्री पर ही होना चाहिए।

सावित्री एक छोटे से रूम को किराए पर लेकर रहती है।पति के रहने पर उसकी जिंदगी अच्छे से कट रही थी लेकिन अब वो कई घरों में चूल्हा-चौका कर अपना गुजारा करती है।सावित्री इतना ही कमा पाती है जितने में उस घर का किराया और उसका पेट चल सके।लेकिन अब वो बच्ची जो उसी के बेटे की करतूत है,बोलकर वो लड़की आती है और जो भी पैसा सावित्री के पास होता है ,उसे वो झगड़ा कर सावित्री से छीन कर ले जाती है। सावित्री जिनके यहाँ काम करती है, वहीं कुछ खाने को मिल गया तो ठीक,नही तो भूखी ही सोती है।

मैं जब सावित्री से बात कर रही थी तब उससे पुछि भी कि, सावित्री दी आप इतना मेहनत करती हैं और ठीक से अपना पेट भी नहीं भर पाती हैं, तो सारा पैसा आप अपने मुहबोली बहु (क्योंकि अभी तक शादी नही हुई थी) को क्यों दे देती हैं।उन्होंने टालते हुए लहज़े में कहा, क्या करूं , आख़िर है तो अपना ही ख़ून।उसे दुःखी कैसे देख सकती हूं ,फिर मेरे पति की आख़िरी निसानी भी तो वही है।उसी को देखकर उनकी मौजूदगी महसूस कर लेती हूं। लेकिन बेटे-बहु के लिए एक भी अपशब्द नहीं निकाला।

सच ही कहा है कि एक औरत में जितनी सहनशीलता होती है, अगर ये समाज समझ ले तो इस औरत के साथ - साथ समाज का भी भला हो जाए ।मेरी माँ उसके महिनवारी तनख़्वाह के अलावे उसके खाने कपड़े का भी ख्याल रखती हैं।मैंने भी सोचा है कि बैंक में उनका एकाउंट खुलवाकर हर महीने कुछ न कुछ उनके बुढ़ापे के लिए डलवा दिया करूँगी।क्योंकि जो बेटा उनके स्वस्थ रहने पर ख्याल नही रखता, वो क्या बूढ़े होने पर रखेगा।

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