पहला दिन था, इसलिए ईन्ट्रोडक्शन ही हुआ और थोड़ा बहुत subjective जानकारी होकर उनका period खत्म हो गया।क्लास तो और subjects के भी हुए लेकिन संतोष मैम ने पहली झलक में ही अच्छे या कुछ लापरवाही वाले अंदाज़ में आकर्षित किया था, इसलिए चाहे-अनचाहे मैं उनको follow करने लगी थी और नई दोस्ती के तरफ कम और उनके तरफ ज्यादा ध्यान देने लगी थी।
मेरी आदत के हिसाब से एक लड़की ख़ुद ही आकर मुझसे मेरा परिचय पुछने लगी और मुझे किसी के पास नहीं जाना पड़ा।"सुमन" हाँ सुमन नाम था उसका।साधारण कद-काठी के साथ बहुत ही शुरिला गला था उसका।उसकी बातों से भी लग रहा था कि उसके साथ मेरी खूब बनेगी।उसके पापा नेवी के ऑफिसर थे,जिस कारण उसका life style काफी डिसिप्लिन वाला था।पढ़ाई-लिखाई में भी अच्छी थी।और अपने गले के हिसाब से गाने का भी शौक रखती थी।ज्यादातर पुरानी फ़िल्मो के गाने - गाती थी।मैं भी High School के शिक्षक की बेटी होने के कारण लगभग उस जैसा व्यवहार ही था।
अगले दिन फिर से संतोष मैम का क्लास था, उन्होंने पढ़ाना शुरू किया।एक-एक फॉर्मूला और उनका समझाने का तारिका मैं तो बिल्कुल ही कायल हो गई थी उनकी।मैथ्स के प्रश्नों को इतनी आसानी से solve करना आज तक किसी ने भी नही सिखाया था।इसके बाद से जब भी मुझे time मिलता या उनको खाली देखती तो उनसे बात करने की कोशिश करती।
बातों-बातों में पता चला कि उनकी कोई संतान नहीं थी और उनके पति का भी बस उनके पैसे से ही उनका रिस्ता था।अपनी परेशानियों को तो उन्होंने कभी ज़ाहिर नहीं किया, पर होंगी तो ज़रूर।वो दिल की बहुत अच्छी थी और चाहती थी कि उनके students हमेशा अच्छा करे, इसके लिए वो extra class भी लेती थी और उससे भी न हो तो घर पर भी आकर बिना tution fee के कोई भी आकर पुछ सकता था।या तो उनको पढ़ाना बहुत अच्छा लगता था, या फिर वो अपने आप को व्यस्त रखना चाहती थी।उनकी संगति में मेरी भी मैथ बहुत अच्छी हो गई थी, इतना ही नहीं graduation में मैंने Top किया था।उसके बाद ही bank में मुझे अच्छे पोस्ट पर जॉब लग गई थी।लेकिन मैं उनके घर आना जाना नही छोड़ी।जब भी मौका मिलता मैं उनके घर चली जाती।उनका सानिंध्य मुझे माँ से कम नहीं लगता, उनको भी मेरे रूप में एक बेटी मिल चुकी थी।जब मेरी शादी हुई तो मेरा कन्यादान भी उन्होंने ही किया था,और ये मेरी इच्छा भी थी।उनके चेहरे पर उसदिन जो शांति और शुकून था,इससे पहले मैं कभी नहीं देखी थी।मेरी सासु माँ का देहांत हो गया और माँ के पास भी मेरा भाई और भावी थी ही सो मैंने मैम को अपने पास रखने का सोच कर उनको रिक्वेस्ट करने लगी।थोड़ी हिचक के साथ वो मान गई।मुझे भी लगा कि किसी बड़े का साया मेरे सर पर भी है।आज उनको गुज़रे हुए एक साल हो गए हैं, मुझे भी शुकुन है कि उनका आखिरी समय शांति से गया।
सच ही कहते हैं कि क़िताब के कवर को देखकर उसकी स्टोरी का पता नही लगाया जा सकता।काश उसी तरह की teacher हर institutes में हो।