समंदर की एक अनकही कहानी
हर पूर्णिमा जिसे याद दिला जाती है...
समंदर की एक अनकही कहानी
जाने कैसी कहानी है
इस समंदर की भी...
कभी अपनी रवानी से
हर दिल को दीवाना बनाता है,
उछलती-कूदती लहरों के संग
बच्चों सा खिलखिलाता है।
कभी किनारे से टकराकर
अठखेलियाँ खूब मचाता है,
और कभी अपनी ही बाँहों में
सारे जहाँ को बुलाता है।
बच्चे क्या, बड़े भी ठहर जाएँ,
इसकी लहरों को देखने के लिए,
कुछ पल अपने सारे ग़म भूलकर
बस इसके संग बहने के लिए।
मगर...
कभी यही समंदर
गुस्से में भर उठता है,
लहरों का संगीत बदलकर
तूफ़ानों में ढल उठता है।
और जब उसका क्रोध
अपनी सारी सीमाएँ तोड़ देता है,
तो सुनामी बनकर
किनारों का इतिहास बदल देता है।
जाने कैसी कहानी है
इस समंदर की भी...
जब समंदर बुलाता है चाँदनी को
कभी-कभी लगता है
समंदर भी किसी का इंतज़ार करता है।
धीरे-धीरे अपनी लहरों को समेटकर,
अपनी बेचैनी को गहराई में छिपाकर,
वह आसमान की ओर देखता है।
और फिर...
चाँद निकलता है।
उसकी चाँदनी
जब समंदर की सतह पर उतरती है,
तो जैसे कोई बिछड़ा हुआ रिश्ता
फिर से मिल जाता है।
लहरें चमक उठती हैं,
रात मुस्कुरा उठती है,
और समंदर...
अपनी ही धुन में
नाचने लगता है।
मानो कह रहा हो—
“आ जाओ...
अब और इंतज़ार मत कराओ,
वरना मेरी बेचैनी
फिर तूफ़ान बन जाएगी।”
चाँदनी और लहरों का रास
फिर चाँदनी
अपनी किरणों का संगीत छेड़ती है।
लहरें उसकी धुन पर
किनारे तक चली आती हैं।
एक लहर जाती है,
दूसरी लौट आती है,
जैसे दोनों मिलकर
कोई पुरानी कहानी दोहरा रही हों।
रात के अँधेरे को दूर कर
चाँदनी अपनी उजली चादर
समंदर पर बिछा देती है।
और समंदर...
अपनी सारी गहराइयाँ भूलकर
उस रोशनी में खो जाता है।
चाँद और समंदर के बीच
शायद कोई रिश्ता है,
कोई अधूरा वादा,
कोई पुरानी मुलाकात,
या शायद...
कोई ऐसी कहानी
जिसे शब्दों में कहना संभव नहीं।
हर पूर्णिमा की अदा निराली है
हर पूर्णिमा की रात
समंदर कुछ अलग ही दिखाई देता है।
उसकी लहरों में
एक अजीब-सी बेचैनी होती है,
जैसे किसी अपने को
बहुत दिनों बाद देखा हो।
चाँदनी आती है,
अपना उजाला बिखेरती है,
लहरों के संग
कुछ पल रास रचाती है।
फिर...
वापस लौट जाती है।
शायद फिर आने का वादा करके।
और उसके जाने के बाद
समंदर धीरे-धीरे शांत हो जाता है।
मानो महीनों की तृष्णा
कुछ पल के लिए बुझ गई हो।
मानो उसने कह दिया हो—
“अब जाओ...
मैं फिर इंतज़ार करूँगा।”
समंदर की वह अनकही कहानी
कुछ तो कहानी होगी
इस समंदर की भी...
जो हर पूर्णिमा
उसे फिर से याद आ जाती है।
कुछ तो रिश्ता होगा
चाँदनी और उसकी लहरों के बीच...
जो चाँद के आते ही
उसे बेचैन कर देता है,
और उसके जाते ही
फिर से शांत।
शायद...
समंदर भी किसी का इंतज़ार करता है।
शायद उसकी भी कोई मोहब्बत है।
शायद उसकी भी कोई अधूरी कहानी है...
जिसे वह हर रात
अपनी लहरों में छिपा लेता है,
लेकिन...
हर पूर्णिमा,
चाँदनी के आते ही,
उसकी वही पुरानी कहानी
फिर से जाग उठती है...
निष्कर्ष
प्रकृति हमेशा शब्दों के बिना भी बहुत कुछ कहती है। समंदर की लहरें, उसकी शांति, उसका तूफ़ान और चाँदनी से उसका रिश्ता शायद हमें यही एहसास दिलाता है कि हर गहराई के भीतर कोई न कोई अनकही कहानी छिपी होती है।
शायद हम सबके भीतर भी एक समंदर है—कभी शांत, कभी चंचल, कभी तूफ़ानी और कभी किसी अधूरे इंतज़ार में डूबा हुआ।
आपसे एक सवाल...
अगर समंदर अपनी कहानी शब्दों में कह पाता, तो आपके अनुसार वह चाँद से क्या कहता? 🌊🌕
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🌿 शब्दों के इस सफ़र में फिर मिलेंगे...
