सावन की बरसात।
देखो जरा,इस बारिश को भी!
कैसे धूप का श्रृंगार किए इठला रही है।
क्या मुझे चिढ़ा रही है?
कह दो इसे,
ये बारिश बस सावन में मचल सकती है।
मेरी तो वो साँसों में घुला है।
साथ नही, तो क्या हुआ?
मुझे प्रत्यक्ष की जरूरत नहीं।
ये हवाएं जो कानो से सरसराते हुए गुजरी है,
तुम्हें क्या पता? कितना कुछ कह गई है।
तुम तो बिन बादल बरस भी नही सकती।
लेक़िन तुम्हारी बारिश से जो ये सौंधी ख़ुशबू फैली है,
उसमे महक उसकी शामिल थी और महका मुझे गईं हैं।
यादों में क्या , आँखे खुली और बंद क्या ?
धड़कनों पर अधिकार उसको दिया है।
माना, कि करती हो तुम जहाँ को हरी,
पर हर मौसम यादों का उपहार उसी ने दिया है।
ऐ बारिश, तू बरस, मगर संभलकर,
तेरी हरियाली तो अच्छी है,
फ़क़त इतना याद रख,
हर ग़रीब के घर की छत, फूस की बनी है।
#सावन_की_बरसात।
Savan-ki-barsaat
✍️Shikha Bhardwaj❣️