सफ़र में ही ज़िंदगी की शाम हो तो बेहतर है | Aparichita

सफ़र में ही ज़िंदगी की शाम हो तो बेहतर है | एक अधूरे मन की कविता

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"कुछ सफ़र मंज़िल तक पहुँचने के लिए नहीं, बल्कि खुद को समझने के लिए होते हैं।"

Introduction

कुछ कविताएँ किसी एक घटना से नहीं जन्म लेतीं, बल्कि वर्षों तक मन में पलते हुए उन अनकहे एहसासों से बनती हैं जिन्हें शब्दों में बाँधना आसान नहीं होता।

"सफ़र में ही ज़िंदगी की शाम हो तो बेहतर है" ऐसी ही एक कविता है। यह उन अधूरे सपनों, बिखरते विश्वासों, बीते समय की यादों और उस सुकून की तलाश की कहानी है जो शायद किसी मंज़िल पर नहीं, बल्कि सफ़र में ही मिल जाता है।

यदि कभी आपको भी लगा हो कि कुछ लोग, कुछ पल और कुछ रिश्ते हमेशा हमारे भीतर ज़िंदा रहते हैं, तो यह कविता शायद आपके दिल तक भी पहुँचे।

विषय सूची 


  • कविता 
  • कविता का भाव 
  • लेखक की बात 
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  • Call to Action

कविता


 

सफ़र में ही ज़िंदगी की शाम हो तो बेहतर है

अब मंज़िलों की तलाश नहीं मुझे,

सफ़र में ही ज़िंदगी की शाम हो तो बेहतर है।

कब तक ख़्वाबों का स्वेटर बुनूँ,

और हर मौसम में

उसे उधेड़कर फिर से शुरू करूँ?

कुछ सपने,

शायद पूरे होने के लिए नहीं,

सिर्फ़ जीने के लिए होते हैं।

एक साया है...

जो बरसों से मेरे जहन में चुपचाप बैठा है।

काश,

एक बार उसका हाथ मेरे हाथ में हो,

और उसी साए में

मेरी थकी हुई साँसें

अपना आख़िरी सुकून पा लें...

तो बेहतर है।

जीने के लिए

सिर्फ़ लंबी उम्र नहीं चाहिए,

एक भरपूर ज़िंदगी चाहिए।

बहुत हुआ...

दूसरों के लिए घरौंदे बनाते-बनाते

अपने ही पंख बिखेर देना।

अब किसी शांत टहनी पर,

वक़्त थोड़ा ठहर जाए...

और उसी ठहरे हुए पल में

हमारा एक लम्हा कैद हो जाए,

तो बेहतर है।

तुम्हें पूरी एक उम्र गुज़ारनी है,

मैं तो बस

इस एक पल में

पूरी ज़िंदगी जी लेना चाहती हूँ।

सुना है,

ख़ुदा तुम्हारी भी सुनता है।

अगर कभी

उसके दर पर जाना,

तो मेरी एक अर्ज़ी भी रख देना—

गुज़रे हुए वक़्त से

बस एक मुलाक़ात करा दे।

कुछ शिकायतें हैं,

कुछ मासूम नादानियों की दरारें हैं,

शायद

कुछ पैबंद अभी भी लगाए जा सकते हों।

महफ़िलों में

मुस्कुराते हुए तन्हा रहना

अब थका देता है।

कभी-कभी लगता है,

ख़ुद को

अपनी ही ख़ामोशी में समेट लूँ...

तो बेहतर है।

अब मंज़िलों की तलाश नहीं मुझे,

सफ़र अगर अपनेपन से भर जाए,

तो वही मेरी ज़िंदगी है...

और उसी सफ़र में

ज़िंदगी की शाम हो जाए,

तो बेहतर है।


🥀🌿🥀🌿🥀🌿🥀🌿

  • क्या आपको लगता है कि मंज़िल से ज़्यादा सफ़र मायने रखता है?
  • इस कविता की कौन-सी पंक्ति आपके दिल के सबसे करीब लगी?
  • कविता का भाव

    यह कविता किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह उन सभी लोगों की आवाज़ है जिन्होंने कभी किसी अपने को खोया है, किसी अधूरे सपने को दिल में संजोया है या फिर ज़िंदगी की भागदौड़ में खुद को कहीं पीछे छोड़ दिया है।

    यह कविता हमें याद दिलाती है कि हर सफ़र का उद्देश्य मंज़िल तक पहुँचना नहीं होता। कुछ सफ़र केवल हमें अपने भीतर लौटना सिखाते हैं।

    लेखक की बात

    यह कविता मैंने लगभग तीन वर्ष पहले लिखी थी। समय के साथ शब्द वही रहे, लेकिन उन्हें महसूस करने का मेरा तरीका बदल गया। आज जब मैं इसे दोबारा पढ़ती हूँ, तो लगता है कि कुछ भावनाएँ समय के साथ और भी गहरी हो जाती हैं। यदि इस कविता में आपको अपनी कोई याद, कोई अधूरा सपना या कोई अनकहा एहसास दिखाई दे, तो समझिए कि मेरे शब्द अपना उद्देश्य पूरा कर पाए।

    यदि यह कविता आपको पसंद आई...

    हो सकता है आपकी ज़िंदगी में भी कोई ऐसा पल हो जो आज भी आपके साथ चलता हो।

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    🌿 धन्यवाद! फिर मिलेंगे एक नई कविता और नए एहसास के साथ।


    ✍️ About the Author

    मैं शिखा हूँ। "Aparichita" मेरे मन के उन शब्दों का घर है जिन्हें अक्सर हम महसूस तो करते हैं, लेकिन कह नहीं पाते। यहाँ मैं कविता, जीवन, रिश्तों और आत्मसंवाद से जुड़ी रचनाएँ साझा करती हूँ।













    Shikha Bhardwaj

    Hi, I'm Shikha. I help English learners improve vocabulary, grammar, speaking confidence, and communication skills through practical lessons and real-life examples.

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