किस गुल के तसव्वुर में है ऐ लाला जिगर-ख़ूँ
ये दाग़ कलेजे पे उठाना नहीं अच्छा
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आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह, युगदृष्टा कवि एवं साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र जी की जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाते हैं। वे हिन्दी में आधुनिकता के पहले रचनाकार थे। इनका मूल नाम 'हरिश्चन्द्र' था, 'भारतेन्दु' उनकी उपाधि थी। उनका कार्यकाल युग की सन्धि पर खड़ा है।
जन्म की तारीख और समय: 9 सितंबर 1850, वाराणसी
मृत्यु की जगह और तारीख: 6 जनवरी 1885, वाराणसी
माता-पिता: गोपाल चंद्र
उल्लेखनीय काम: अन्धेर नगरी, भारत दुर्दशा
काल: आधुनिक काल
1. दिल आतिश-ए-हिज्राँ से जलाना नहीं अच्छा
दिल आतिश-ए-हिज्राँ से जलाना नहीं अच्छा
ऐ शोला-रुख़ो आग लगाना नहीं अच्छा
किस गुल के तसव्वुर में है ऐ लाला जिगर-ख़ूँ
ये दाग़ कलेजे पे उठाना नहीं अच्छा
आया है अयादत को मसीहा सर-ए-बालीं
ऐ मर्ग ठहर जा अभी आना नहीं अच्छा
सोने दे शब-ए-वस्ल-ए-ग़रीबाँ है अभी से
ऐ मुर्ग़-ए-सहर शोर मचाना नहीं अच्छा
किस गुल के तसव्वुर में है ऐ लाला जिगर-ख़ूँ ये दाग़ कलेजे पे उठाना नहीं अच्छा(you tube video)
तुम जाते हो क्या जान मिरी जाती है साहिब
ऐ जान-ए-जहाँ आप का जाना नहीं अच्छा
आ जा शब-ए-फ़ुर्क़त में क़सम तुम को ख़ुदा की
ऐ मौत बस अब देर लगाना नहीं अच्छा
पहुँचा दे सबा कूचा-ए-जानाँ में पस-ए-मर्ग
जंगल में मिरी ख़ाक उड़ाना नहीं अच्छा
आ जाए न दिल आप का भी और किसी पर
देखो मिरी जाँ आँख लड़ाना नहीं अच्छा
कर दूँगा अभी हश्र बपा देखियो जल्लाद
धब्बा ये मिरे ख़ूँ का छुड़ाना नहीं अच्छा
ऐ फ़ाख़्ता उस सर्व-ए-सही क़द का हूँ शैदा
कू-कू की सदा मुझ को सुनाना नहीं अच्छा
(आतिश-ए-हिज्राँ=विरह की आग, पस-ए-मर्ग=
मौत के बाद, हश्र=प्रलय,क़यामत)
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