Aparichita
Thoughts • Stories • Inner Reflections
When the Moon Speaks to the Heart
पूर्णिमा की रात : जब चाँद मन से बात करता है
कभी-कभी प्रकृति ऐसे क्षण रच देती है, जब समय भी ठहर सा जाता है।
आज की यह पूर्णिमा की रात भी कुछ वैसी ही लगी। चाँद इतना उजला और निखरा हुआ था कि लगा जैसे रात ने दिन का रूप ले लिया हो।
अक्सर मेरी आदत है कि यूँ ही कभी कभी अकेले प्रकृति को समझने का कोशिश करती हूँ और इना खो जाती हूँ की उससे बातें कर रही हूँ। और आज भी जब मैंने आकाश की ओर देखा, तो लगा जैसे चाँद सिर्फ आसमान में नहीं, बल्कि मेरे मन में भी उतर आया हो। उसी क्षण मन में ये पंक्तियाँ उतर आईं।
आज पूर्णमासी है और चाँद सूरज सा निखरा हुआ है,
तभी तो इसने रात को भी दिन सा किया हुआ है।
जैसे किसी प्रिय और प्रिया को
अपनी नज़र में थामे खड़ा हुआ हो।
और चाँदनी से जहाँ को रौशन किया हुआ है,
जैसे अपनी खुशियों की चाँदी बिखेरे हुआ है।
कुसुम-कलियाँ मुग्ध सी, खुशबू-खुशबू हुई हैं।
पपीहों ने भी तान छेड़ दी है,
निर्मल पवन इतराई हुई है।
As if there is only me… and this moon that feels like mine.
मेरे मन-प्रसून में भी
आस की एक ज्योत प्रस्फुटित हुई है।
जैसे एक मैं हूँ, और ये मेरा ही चाँद है।
कतरा-कतरा ये भी बढ़ता जाता।
बिन बोले सब मेरी सुनता,
मैं भी इसको पढ़ती जाती।
आज वक़्त के आगोश में
सब बदला-बदला सा है।
शायद प्रकृति का यही जादू है—
जब मन शांत होता है, तो चाँद भी अपना लगता है और रात भी एक कहानी कहती हुई सी लगती है।



