रात के सन्नाटों से शुरू हुई गुफ़्तगू | यादों की बारात और बीते लम्हों की कहानी
रात के सन्नाटों से शुरू हुई गुफ़्तगू...
कुछ रातें केवल सोने के लिए नहीं होतीं।
कुछ रातें हमारे भीतर छिपी उन आवाज़ों को सुनने आती हैं जिन्हें दिन के शोर में हम अनसुना कर देते हैं।
जब चारों ओर सन्नाटा होता है, तब मन बीते हुए वर्षों के बंद दरवाज़ों और खिड़कियों को धीरे-धीरे खोलने लगता है। यादें लौटती हैं, कुछ मुस्कुराती हुई, कुछ आँखों को नम कर देने वाली।
इन्हीं एहसासों को शब्द देने का एक प्रयास है यह कविता—
रात के सन्नाटों से शुरू हुई गुफ़्तगू...
रात के सन्नाटों से शुरू हुई गुफ़्तगू,
बीते वक़्त के बंद दरवाज़ों पर
धीमे-धीमे दस्तक देती रही।
एक-एक कर यादों की खिड़कियाँ खुलीं,
और लम्हा यूँ ठहर गया,
मानो समय ने अपनी चाल रोक दी हो।
फुसफुसाहटों का शोर भी
रात की तहों में कहीं खो गया था।
दरों-दीवारों संग बैठी रात,
मेरे ही किस्से सुनाती रही।
कुछ बीते दिनों की दास्तानें थीं,
कुछ आज की उलझी हुई कहानियाँ।
मेरी यादों की बारात
चाँदनी ओढ़े मेरे आँगन में उतर आई थी,
और हर भूला हुआ चेहरा
फिर से अपना परिचय दे रहा था।
कुछ यादें मुस्कुराहट बनकर आईं,
कुछ आँखों में नमी छोड़ गईं।
मैं भी अपने दिल की
मुफ़लिसी के किस्से दोहराती रही,
उन सपनों का हिसाब करती रही
जो कभी मेरे थे,
और अब केवल स्मृतियाँ हैं।
वक़्त के कितने ही रंग सामने आए—
कुछ में आँसू थे,
कुछ में हँसी की महफ़िलें सजी थीं।
कुछ रिश्ते थे,
जो साथ होकर भी दूर रहे,
कुछ दूरियाँ थीं,
जो आज भी दिल के क़रीब हैं।
रात सुनती रही,
मैं कहती रही।
यादें आती रहीं,
मैं जीती रही।
और इस तरह
रात के सन्नाटों से शुरू हुई गुफ़्तगू
मेरे भीतर के कई मौसमों को
फिर से जगा गई।
सुबह की पहली किरण तक,
मैं और मेरी यादें
एक-दूसरे का हाथ थामे
बीते वक़्त की गलियों में
यूँ ही चलते रहे...
कविता का भाव
यह कविता केवल यादों की बात नहीं करती, बल्कि उस आत्म-संवाद की कहानी है जो अक्सर रात के शांत पलों में शुरू होता है। बीते हुए दिन, अधूरे सपने, खोए हुए लोग और बची हुई मुस्कुराहटें—सब एक साथ मन के आँगन में उतर आते हैं।
कभी आँसू बनकर, कभी मुस्कान बनकर।
और शायद यही जीवन है—यादों के साथ चलती हुई एक अंतहीन यात्रा।
पाठकों से एक प्रश्न
क्या आपकी ज़िंदगी में भी कोई ऐसी रात आई है जब यादों ने आपको सोने नहीं दिया?
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