रंग भेद ।कविता,poem, thoughts,abhivyakti

काला, सफ़ेद, हरा, नीला,पीला
प्रकृति का हर रंग निराला।
हर रंग इसी ने दिये हैं,
फिर इंसानों ने क्यों वहम है पाला।

कहते रंग अशुभ है काला,
पर देखो सफेद बादलों ने भी तो
जल भर श्रृंगार किया है काला।
अप्सराओं के गेसू काले
तो नजर का टीका भी तो काला।

राम और घनश्याम तक काले,
मीरा की चाहत भी तो काली।
उसने भी तो पल - पल ,
रंगने की चाहत भी कर डाली,काली।

नयनों का रंग भी देखो,
सभी को बस भाया है काला।
इन काले नयनो पर तो न जाने
कितने कवियों ने कविता है गढ़ डाला।

हां ये अलग है कि पुण्य सफ़ेद तो,
पाप है काली।
बूढ़े माँ-बाप को निःसहाय
छोर देने की करतूत भी काली।

काँव-काँव करने वाला
कउआ काला, तो मीठे सुर देने वाली
कोयल भी है काली।
भेद तो बस करतूतों का है,
एक ने शोर मचाई, तो दूजे ने
मीठे तानो की बरसात है कर डाली।

फिर क्या हक इंसानों का जो,
इनके बीच भेद है कर डाला।
काला, सफ़ेद, हरा, नीला, पीला
प्रकृति का हर रंग निराला।

Shikha Bhardwaj

Hi, I'm Shikha. I help English learners improve vocabulary, grammar, speaking confidence, and communication skills through practical lessons and real-life examples.

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