ये पल भी गुजरा कल होगा,
सच कहते हैं ,
जैसे शुख बीते,
दुःख कभी अन्त समय होगा।
रख इख़्तियार,खुद और खुदा पर,
जैसे हुआ बसर दुख का,
वैसे ही यह गुज़र होगा।
रख इख़्तियार ख़ुद और खुदा पर।
माना कि घोर अंधेरा है,
पर समय का पहिया कहां थमता है।
हर शाम के बाद सबेरा,
यही दुनियां का रेला।
देख प्रकृति ने भी
यही खेल है खेला।
हर पतझर के बाद,
वसंत का ही तो मेला।
उस वसंत का आनन्द बड़ा,
या अवसन्नता पतझड़ का ।
किसका करोगे मोल बड़ा ?
आनन्द या अवसाद चुनोगे।
गुजर करोगे विपदाओं को गिन,
या समेट रेशमी किरणों को,
रौशन जग में कर्म करोगे।
आनन्द या अवशाद चुनोगे।