मानस प्रवचन

भगवान श्री राम वन यात्रा में महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में जातें हैं।महर्षि के चरणों में प्रभु ने नमन किया।महर्षि उनका स्वागत करते हैं।उस स्वागत के पश्चात प्रभु उनसे पुछते हैं कि हे मुनिराज! आप मुझे ऐसे स्थानों की ओर संकेत कर जहाँ मैं निवास करूँ।

प्रश्न सुनकर महर्षि वाल्मीकि ने इसे केवल स्थूल अर्थो में ही नहीं लिया।क्योंकि स्थूल अर्थ तो इतना ही था कि भगवान को चौदह वर्षों तक वन में रहने का आदेश दिया गया था, और प्रभु महर्षि से यह जानना चाहते हैं कि इस चौदह वर्षों की अवधि के लिए उन्हें कहां रहना चाहिए।महर्षि वाल्मीकि अगर भगवान राम को सिर्फ राजकुमार के रूप में देखते होते तो उसका उत्तर देना अत्यधिक सरल था।परंतु वे जानते थे कि उनके समक्ष राजकुमार के रूप में जो विद्धमान हैं, वे साक्षात परब्रह्म हैं।अतः महर्षि ने उनके प्रश्नों को साधारण अर्थों में नहीं लिया।इसलिए जो उत्तर उन्होंने दिया वो मात्र स्थूल नही था।यद्यपि वो स्थूल दृष्टि से भी यह कहते हैं कि आप चित्रकूट में निवास कीजिये, पर उससे पहले उन्होंने भगवान श्री राम से एक व्यंग्य भरा प्रश्न कर दिया।

महर्षि वाल्मीकि ने कहा कि आपने तो निःसंकोच मुझसे पुछ दिया कि मैं कहाँ रहूँ, पर मुझे तो पूछते हुए संकोच हो रहा है, क्योंकि मेरे प्रश्न को सुनकर आपको लगेगा कि मैं आपके प्रश्नो को काटने की चेष्टा कर रहा हूँ पर आपका प्रश्न इतना अटपटा है कि उस प्रश्न के बदले मैं प्रश्न कर सकता हूँ।तब मुनिराज ने पूछा कि आप कृपा करके पहले यह बताइये की आप कहाँ निवास नहीं करते हैं ? और जब आप मेरे इस प्रश्न का उत्तर दे देंगे तो मैं भी कह दूँगा कि आप यहाँ रहिए।पर इसके पश्चात महर्षि ने भगवान राम के प्रश्न का विस्तार से उत्तर दिया।प्रस्तुत प्रसंग को पढ़कर ऐसा लगता है कि जैसे महर्षि की बाते परस्पर विरोधी हो।क्योंकि भगवान राम ने तो कोई उत्तर दिया ही नहीं अपितु प्रश्न करने के पश्चात उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना ही ऋषि महोदय उत्तर भी देने लगे।इस विरोधाभास का तात्पर्य क्या है इस पर एक दृष्टि डालने की अपेक्षा है।इस संदर्भ में कई सूत्र कहे जा चुके हैं तथा आज भी मैं एक दो संकेत आपके सामने रखना चाहूंगी।

वेदांत की भाषा में कहा जाता है कि ब्रह्म असीम हैं, अनन्त हैं।किन्तु ऐसे ब्रह्म का जब हम अवतार के रूप में, एक व्यक्ति के रूप मे वर्णन करते हैं तो क्या वह ससीम नही हो जाता है।? और असीम से ससीम होकर क्या वह उतना परिपूर्ण रहेगा ?परंतु इसमे एक बरे महत्व का सूत्र यह है कि निर्गुण - निराकार ब्रह्म के प्रतीक के रूप में हम आकाश की कल्पना करें, क्योंकि आकाश असीम हैं, अनन्त है।

Shikha Bhardwaj

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