स्याह जिंदगी

ख़ामोश जुबा,
हज़ारों सवाल करती ये नज़र।
स्याह जिंदगी के सफ़र की मैं रहगुज़र। 
न कोई राह है ना कोई रहबर।
वो गया मुझको छोड़ इस कदर,
न साहिल है ना किनारा,
खड़ी हूँ वहाँ, जहां है भँवर।
दम घोंटती रश्मों की ऊंची दीवार।
ख़ामोश जुबा,
हज़ारो सवाल करती ये नज़र।
हर शाम गुजार दी ये सोचकर,
कभी तो होगी
मेरे ग़मो की शाम और खुशी की सहर।
क्या पता था कि,
इससे भी स्याह है मेरी मुक़द्दर।
ये स्याह जिंदगी की सफ़र,
और न जाने है कितनी लंबी डगर।
अब तो ये उम्र भी लग रही कमतर,
न जाने कब  होगी खत्म
बेचैन साँसों की पहर।
ख़ामोश जुबा,
हज़ारो सवाल करती ये नज़र।
अच्छा है कि खुद ही लूँ खुद को सम्हार,
दूँ दिलों को दिलाशा,
कि ये स्याह जिंदगी ही है तेरी रहबर।
तू हो तैयार,
की स्याह ज़िंदगी की सफर,
इस जन्म में न होगी कमतर।
ख़ामोश जुबा,स्याह जिंदगी,
हजारों सवाल करती ये नजर।

Post a Comment

If you have any doubt, please let me know.

Previous Post Next Post