शून्य सा जीवन


खाली अम्बर सा खाली मेरा मन
और शून्य सा ये जीवन
न कोई सोच न कोई उमंग,
बस विषादों का आलिंगन
और सामने पहाड़ सा ये जीवन।
भीड़ में तन्हाई का सफ़र
तुम नहीं, तुम्हारी यादों का कहर।
और सुनेपन का प्रलम्बन।
जीवन की ढलती शाम नही ,
दुःखो की कोई आयाम नहीं।
बस प्रलापों का बन्दन
और सूखे आँशुओं का  क्रंदन।
अंधियारे का हुआ जीवन मे आसन्न,
और दूर हुआ हर छन से प्रसन्न।
खाली अम्बर सा खाली मेरा मन   
और सूखे आँशुओं का बस क्रंदन।
कलरव करती भोर हुई गमन,
और जीवन में शाम का हुआ शमन
न जाने कब आएगी भोर भरी अमन,
और होगा कभी खुशियों से
मेरा भी मिलन।
खाली अम्बर सा खाली मेरा मन।

                               और शून्य सा ये जीवन।

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