अधूरा फ़साना

 


ख्वाबो के पीछे भागते -भागते न जाने कब कोई अपना ही छूट जाए। वो अपना जो आपका सब कुछ था ,जिस पर आपका आज ,बिता हुआ कल और आने वाला कल सब निर्भर था। जिससे आपकी जिंदगी थी ,पर आज वो नहीं है। खुद तो उसने अपनी अधूरी जिंदगी जीई है और आपको तो पूरा ही खाली कर गया है। अपने ही खयालो में खोई सुगंधा सोचे जा रही थी अपनी नई  उपाधि के बारे में,जो कुछ महीने से उसे मिली थी.वो थी "विधवा " की। 

सुगंधा अक्सर दुसरे को सलाह दिया करती थी कि जब भी परेशान हो तो अच्छी सी  साड़ी और मेकप कर लिया करो, देखो! कैसे मूड बदल जाते हैं।  और आज वो  खुद को ही नहीं समझा पा रही थी कि  क्या करे। पति के जिन्दा रहते न जाने उसे कितना सुख मिला और नहीं,किन्तु उसके जाने के बाद से जो ये बड़ा सा विधवा नाम का तमगा और उससे जुड़े न जाने कितने प्रचलन उसे हर वक्त तोड़ने और झकझोड़ने के लिए तैयार रहते हैं।

जिंदगी कभी बहुत ही आसान लगती है कभी वही ईतनी मुश्किल कि साँस लेने में भी कठिनाई सी लगती है। एक  बेटी है ,जिसे जन्म के बाद से ही,देखते ही न जाने कैसी हिम्मत आती है।  जो कभी पति से भी नहीं मिली।उसको अच्छे से पढ़ाना है ,पर कैसे ? न तो वो कुछ करती है और न ही पति कुछ छोड़ गए है ,सिवाय नाम के और बेटी के। हां सुगंधा की बेटी उसकी अंतिम पूंजी के रूप में जरूर है।20 सालो के सफ़र मे सुगंधा के मन को जो सुकून दे सकती है, वह है उसकी बेटी सौम्या।बचपन से ही,जब उसकी बेटी ने चलना सीखा ही होगा, तभी से सुगंधा को न जाने क्यों उससे उसको शक्ति मिलने लगी थी।चाहे कितना भी परेशान या घर के हालात कैसे भी क्यों न हो अपनी बेटी को देख कर उसे शांति मिलती थी।

18 साल की मासूम भी तो आज अनाथ हो गई थी। पापा के घर में बहुत ऐश नही थी, वहां पैसों की तंगी हमेशा रहती थी लेकिन फिर भी वो अपने पापा से खुलकर फरमाइशें कर सकती थी पूरा हुआ तो ठीक, नही तो थोड़ी नाराज़गी के साथ ख़ुद ही मान जाया करती थी।यहां दादा जी के घर मे पैसों की कमी नही है,लेकिन वो दादा जी है, पापा नहीं। जिनकी और कई संताने हैं, जो कहने के लिए सभी अच्छे पोस्ट पर काम करते है, लेकिन फिर भी सभी अपनी -अपनी ज़रूरत के हिसाब से पैसे लेने यहीं से आते हैं। इन 4-5 महीने में सौम्या मन को दबाना अच्छे से सिख गई है।उसको देखकर सुगंधा को मन ही मन दर्द होने लगा है, कितनी तकलीफ में है मेरी बच्ची,इतनी छोटी सी उम्र में उसने कैसे अपने आप को control कर लिया है।ना कोई फरमाइशें न कोई जबाब, बस पढ़ाई और दादी-बाबा के छोटे-मोटे कामो में लगी रहती है।कभी-कभी मुझसे वो मन की बात करती है,लेकिन मैं उसे दिलाशे के सिवा कुछ भी नहीं दे सकती।हर वक्त सामने अँधेरा सा छाया रहता है। सुगंधा कुछ समझ नहीं पा रही थी कि वो करे तो क्या। जिंदगी में अब तक जो भी उसने पाया था उससे उसे भविष्य में सिर्फ डर लग रहा था। किसी की किस्मत क्या इतनी भी खराब हो सकती है। बोलने के लिए सारे रिश्ते उसके पास थे ,पर शायद सभी मतलब के। अभी अगर कोई उसे अपना लग रहा था, तो वो थी उसकी बेटी सौम्या बस। सुगंधा कभी तो एकदम positive thinking के साथ भर उठती थी तो दूसरी तरफ एकदम हारा हुआ महसूस कर रही थी। जब से उसकी शादी हुई थी तभी से ही वो किसी गॉड फादर या किसी सुपर मैन का ख़याल कर रही थी। वो तो नहीं मिले थे पर उसकी दुनिया जरूर लूट गई थी।दूसरी तरफ सुगंधा को सबसे ज्यादा दया की दृष्टि ही चुभती है ,इसलिए सुगंधा ने कभी दूसरे के सामने ठीक से आँशु भी नहीं बहाए है। इसके लिए उसे एकांत ही पसंद है। दूसरी तरफ बेटी को और दुःख नहीं दे सकती इसलिए उसका भी खयाल कर क़भी रोने की कोशिश नही करती।इससे नई बात जानने को मिली है कि आँशु बहाना कितना आसान है,लेकिन उसको रोककर आँखों और गले मे जो दर्द होता है,कितना मुश्किल है।

                              सुगंधा को क्या करना चाहिए ,कोई सुझाव दे सकता है ?

 


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