जाने वो कैसे लोग होंगे,
जिन्हें जिंदगी गिराकर सिखाती है।
उनका क्या ,
जिनकी जमीन ही खिसक गई हो।
किधर लड़खड़ाए और किधर खड़े हो ?
टुटे हुए दरख़्तों से आख़िर,
सहारे का भरोसा कब तक ?
जाने वो कैसे लोग होंगे,
जिन्हें जिंदगी में मसीहे मिले हैं।
उनका क्या ,
जिनका अपनो से भी वास्ता
गैरों की तरह हुआ है।
अपनो की याद भी ,
मतलब ही खींच लाती है।
कहते हैं कि हर कण में,
भगवान बसते हैं,
तो फ़िर वो सबके लिए क्यों नही होते।