किताबें बड़ी या जिंदगी की सिख बड़ी?
शोफ़े पर बैठी कुछ धूल फांकती किताबों को मैं निहारे जा रही थी। अंतर्मन बड़ी दुविधा में पड़ा था। सोचें जा रही थी कि कौन बड़ा है, किताबों की सीख या जिंदगी की ? मेरे लिए तो किताबों से जिंदगी का पलड़ा ज़्यादा भारी था। ज़िन्दगी ठोकर दे दे कर सिखाती है और किताबें नई बात को बताती है। कितना बातों को ध्यान में रखा जाए, या फिर वक्त के दिए चोट से कुछ नया सीखा जाए।
तो आइए, देखे कि कौन बड़ा?"
किताबें बड़ी या जिंदगी की सिख बड़ी?
किताबें बड़ी या जिंदगी की सिख बड़ी?
किताबें बड़ी या जिंदगी की सिख बड़ी?
बैठ शोफ़े पर मैं इसी सोंच में पड़ी।
तभी किताबे मेरी झट से बोल पड़ी,
किस बात का यूँ ताना-बाना!
मैं थी बड़ी और मैं ही रहूंगी बड़ी।
मैं भी यूँ ही दुविधा में पड़ी,
कि ठीक है, जिंदगी की सीख बड़ी...
लेकिन गर जो किताबें भी न होती,
तो क्या ले पाती समय पर मैं निर्णय बड़ी?
कभी जो बैठो तन्हाई में तो यही किताबें,
रह संग करती तुमसे गुफ्तगू बड़ी।
तो कभी, कर लो पूरी दुनियां की सैर वहीं खड़ी।
गर बना लो इसे जिंदगी की संगिनी,
फिर न कोई फिकर न कोई कमी,
ज्ञान का सागर पाकर, रहो यही,
इसी वक्त कर लो जिंदगी की सबसे मौज बड़ी।
अध्यात्म हो या करनी खोज विज्ञान की बड़ी,
हर जगह सार्थक होता,
है जो यह जादू की छड़ी,किताब मेरी।
लेक़िन अब जब बातें चलीं ज़िन्दगी के सीख की,
तो बोलो भला कि कौन सा किसान,
है जो मोती पोथी पढ़ा?
फिर भी मौसम विभाग की सारी जानकारी,
देता है पल भर में बता।
संवेदनाएं जो सीखी है, उम्र गुजारकर,
बोलो भला किस किताब में है लिखा।
मेरी उलझन और भी है, उलझ गई,
बोलो भला कौन छोटा और बड़ा।
किताबें बड़ी या जिंदगी की सिख बड़ी?
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Shikha Bhardwaj___✍️
