क्या फर्क है, इस समंदर में और मन के अथाह सागर में?
Kya fark hai, is samandar me aur man ke athah sagar me?
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क्या फर्क है, इस समंदर में और मन के अथाह सागर में? |
क्या फर्क है, इस समंदर में और मन के अथाह सागर में?
खुशी के या ग़म के हिलकोरें खाते मन में।
सोचो जरा!
उतशृंखल मन क्या कुछ रख पाती अंदर में?
हरदम - हरकुछ लिए, बस जुबान या आँखो में।
कहते हैं, समंदर भी कुछ न रखती, सब लौटा देती,
जो भी हो गहराई में।
क्या फर्क है, इस समंदर में और मन के अथाह सागर में?
खुशी के या ग़म के हिलकोरें खाते मन में।
सोचो कितनी बाते अंदर मन सागर में,
कितनी नावें और जहाज़ डुब गई इस समंदर में।
मन ने भी तो कोई भेद न खोला,
जैसे मिल गई हो, कई नदियां इस समंदर में।
नीला गगन बस देखता रहता,
जैसे मेरे मन को सितारे तन्हाई में।
क्या फर्क है, इस समंदर में और मन के अथाह सागर में?
खुशी के या ग़म के हिलकोरें खाते मन में।
ख़ुशी के उमंग में,लहरें भी लाती नई रवानी,
क्या बच्चे क्या बूढ़े, सबको भिगा,
माथे पर लिखती, खुशी की नई कहानी।
सब खुशनुमा, सब नूरानी।
गर हो गमें अफ़साना,तो फ़िर ये लहरें कहती
कुछ और ही फ़साना।
सबकुछ धुंधला, सब वीराना
सिर्फ मझधार, न कोई किनारा।
क्या फर्क है, इस समंदर में और मन के अथाह सागर में?
खुशी के या ग़म के हिलकोरें खाते मन में।
कभी यही शांत शीतल लहरे,
मन उदवेगों को धर्य सिखाती।
कभी इनकी उतश्रृंखल मौजे,
मन भवरें को चंचल करती।
उछल-उछल कर, खेल कूद कर
बूढ़े को भी बचपने का एहसास दिलाती।
कभी इसकी हर हरक़त पर,
लगाती प्रश्न निशानी।
हुआ क्या है? जो इतनी कल्लोलें करनी।
मेरे मन के हिलकोरे को क्यों
अपने शोर बीच यूँ ही दबानी।
लहरों की सच्ची हरकतें भी,लगती शिर्फ़ परेशानी।
क्या फर्क है, इस समंदर में और मन के अथाह सागर में?
खुशी के या ग़म के हिलकोरें खाते मन में।
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#Aparichita हरदम हरवक्त आपके साथ है। #Aparichita कुछ अपने, कुछ पराए, कुछ अंजाने अज़नबी के दिल तक पहुँचने का सफर। #aparichita इसमें लिखे अल्फ़ाज़ अमर रहेंगे, मैं रहूं न रहूं, उम्मीद है, दिल के बिखड़े टुकड़ो को संभालने का सफर जरूर आसान करेगी। #aparichita, इसमें कुछ अपने, कुछ अपनो के जज़बात की कहानी, उम्मीद है आपके भी दिल तक जाएग
Shikha Bhardwaj____✍️
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बहुत खूब 👌👌👌
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