श्री राम द्वारा जीवन रूपी रथ को चलाने के लिए विभषन संग संवाद।

 

श्री राम द्वारा जीवन रूपी रथ को चलाने के लिए विभषन संग संवाद।

Shri Ram dwara jivan rupi rath ko chalane ke lie Vibhishn sang samvaad.

परिचय:-

हमारे आस-पास ऐसे कई लोग देखने को मिल जाते हैं जो ज्यादा पढ़ना लिखना नहीं जानते पर मानस और सुंदरकांड की चौपाइयाँ उनके मुख अनायास ही व्याख्या करने लगते हैं।और बहुत कुछ सीखने को भी मिल जाता हैं। उसी में से एक प्रसंग है....विभषन का प्रभु श्री राम के प्रति चिंतित होना कि श्री राम बिना रथ के भूमि से शक्तिशाली रावण के साथ कैसे युद्ध करेंगे।

नीचे इस प्रसंग की व्याख्या है- 
रथ जो कि विभषन को शिर्फ़ एक युद्ध में सहयोग और विजय का माध्यम दिख रहा है, वास्तव में ...यथार्थ जीवन मे उसकी महत्ता क्या है और ये विजय का  रथ सिर्फ धातु से नही बल्कि जीवन के संघर्ष, साहस, दृढ़ निश्चय, धर्य आदि गुणों से बनता है।
और जानने के लिए पढ़े और सुझाव भी दे।

क्या आप जानते है कि जब राम और रावण युद्ध चल रहा था तब रावण रथ पर था और राम भूमि पर ही खड़े होकर लड़ाई कर रहे थे।

श्री राम द्वारा, जीवन रूपी रथ को चलाने के लिए मुख्य बातों का उल्लेख: श्री राम और विभषन संवाद।


स्वाभाविक जीवन मे रथ की परिकल्पना, कितने लोग है जो जीवन से कर पाते है, और जीवनरूपी रथ को चलाने के लिए किन- किन मानुषिक चेतनाओं को जागृत करनी होती है?

इन्ही विचारों के भंवर में फसे मानव अवचेतन को सड़ल करने के लिए श्री राम ने विभीषण को जो बताया था, वो सब अगर मनुष्य रोजमर्रा की जिंदगी में पालन कर ले तो फिर वो किसी भी भय और कठिनाइयों से ऊपर उठ जाएगा, कोई भी बाधा उसके जीवन के मार्ग को अवरुद्ध नही कर पाएगी।


रामायण की कुछ चैपाइयों में श्री राम और विभीषण के बीच हुए मानसिक अवचेतनों को सरल करने का एक प्रसंग है.....जब रावण अपने रथ पर सवार होकर , राम जी से युद्ध कर रहा था, लेकिन राम जी के पास ऐसा कुछ नही था।

ये देखकर विभीषण की भक्ति , राम जी के प्रति उन्हें थोड़ी चिंतित कर देती है।

उन्हें लगने लगता है...रावण से ऐसे लड़ाई में तो सायद प्रभु श्री राम हार जाएंगे।


इसी से संबंधित एक चौपाई है:


🚩रावनु रथी बिरथ रघुबीरा-देखि बिभीषन भयउ अधीरा।। 

अधिक प्रीति मन भा संदेहा-बंदि चरन कह सहित सनेहा।।🚩

रावण  को रथ पर  और प्रभु श्रीराम को पैदल देखकर बिभीषन अधीर और परेशान  हो जाते हैं।


विभीषण प्रभु श्री राम के भक्त थे, और प्रभु से स्नेह वस..होने पर उनके मन में संदेह आने लगता है कि प्रभु भूमि पर रहकर, कैसे रावण का मुकाबल करेंगे? और श्रीराम के चरणों की वंदना कर वो कहने लगे:


नाथ न रथ नहि तन पद त्राना-केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥ सुनहु सखा कह कृपानिधाना-जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥ 

हे नाथ आपके पास न तो रथ है, और न ही शरीर की रक्षा करने वाला कवच ही और पैरों में भी  पादुकाएं नहीँ हैं...इस तरह से रावण जैसे बलशाली और वीर पर जीत कैसे प्राप्त हो पाएगी? 

तब कृपानिधान प्रभु श्री राम बोले- हे सखा सुनो, जिस रथ से जय होती है...वह यह रथ नही है, ये तो कोई दूसरा ही रथ है॥


सौरज धीरज तेहि रथ चाका-सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका ॥ 

बल बिबेक दम परहित घोरे-छमा कृपा समता रजु जोरे ॥

इस चौपाई के द्वरा प्रभु श्री राम ने उस रथ की व्याख्या की....जिससे जीत हासिल की जाती है। जिसमे काठ या धातु के पहिए नही..


बल्कि धैर्य और शौर्य ही उस रथ के पहिए हैं। सदाचार और सत्य उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं। विवेक, बल, इंद्रियों को वश में करने की शक्ति और परोपकार ये चारों उसके अश्व हैं। ये क्षमा, दया और समता रूपी डोरी के जरिए रथ में जोड़े गए हैं।


ईस भजनु सारथी सुजाना-बिरति चर्म संतोष कृपाना ॥ 

दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा-बर बिग्यान कठिन कोदंडा ॥  

इस चौपाई में प्रभु ने सारथी का उल्लेख कर उनके बारे में बताया है कि जो रथ को चलाता है..उसके लिए  ईश्वर का भजन ही रथ का चतुर सारथी है । वैराग्य ढाल बनकर और संतोष तलवार बनकर उसके साथ रहती है। दान ही फरसा है और बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, श्रेष्ठ विज्ञान धनुष है।


अमल अचल मन त्रोन समाना-सम जम नियम सिलीमुख नाना ॥ कवच अभेद बिप्र गुर पूजा-एहि सम बिजय उपाय न दूजा ॥ 

पाप से मुक्त और स्थिर मन तरकस के समान है। वश में किया हुआ मन, यम-नियम, ये बहुत से बाण हैं। ब्राह्मणों और गुरु का पूजन अभेद्य कवच है। यही सब मिलकर मनुष्य को जीत अथवा मोक्ष की ओर ले जाने में सक्षम है। इसके समान विजय का दूसरा और कोई उपाय नहीं है।


सखा धर्ममय अस रथ जाकें-जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें ॥ 

प्रभु श्री राम फिर कहते हैं:

हे बिभीषन यदि किसी योद्धा के पास ऐसा धर्ममय रथ हो तो उसके सामने शत्रु होता ही नहीं,  वो हर क्षेत्र में जीत हासिल करने की क्षमता रखता है।


महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर

जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर।। 


प्रभु श्री राम विभीषण को समझाते हुए कहते हैं.. है धीरबुद्धि वाले सखा सुनो, जिसके पास ऐसा दृढ़ संकल्पित रथ हो, वह वीर संसार (जन्म मरण का चक्र) रूपी महान दुर्जय शत्रु को भी जीत सकता है, कैसी भी परिस्थिति हो..वह डटकर,उसका सामना करता है और वैसे निर्भय महापुरुष का: रावण को जीतना मुश्किल कैसे हो सकता है।


सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरषि गहे पद कंज

एहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज ।। 


प्रभु श्रीराम के वचन सुनकर बिभीषन प्रफुल्लित हो गए और उनको जिंदगी रूपी रथ और रावण रूपी कठिनाइयों को पार करने का मंत्र श्री राम से प्राप्त हो चुका था। इसलिए विभीषण प्रभु श्री राम के चरण पकड़कर कहते हैं:

हे प्रभु, आपने इस युद्ध के बहाने मुझे वो महान उपदेश दिया है जिससे जीवन के किसी भी क्षेत्र में विजय पाने का मार्ग मिल गया है। ये मंत्र पाकर मैं धन्य हो गया। 

इतना कहकर विभीषण प्रभु श्री राम के चरणों पर गिर जाते है और श्री राम विभीषण को उठाकर गले लगा लेते है।


यहाँ रामायण की चौपाइयों द्वारा ज़िन्दगी के गूढ़ रहस्यों को समझाने की कोशिश की गई है। जब हम असल ज़िन्दगी में इनक प्रयोग या अनुसरण करने की कोशिश करेंगे तो बहुत सारी कठिनाइयों, डर, या मोक्ष को प्राप्त कर पाएंगे।

रामायण में प्रभु श्री राम स्वयं नारायण होने के बाबजूद जीवन की हर कठिनाइयों को दृढ़ संकल्प, साहस, वैराग्य और त्याग के साथ पूर्ण किया है।

जिसको समझकर साधारण से साधारण मनुष्य इस जीवनरूपी वैतरणी को पार कर मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।


श्री राम द्वारा, जीवन रूपी रथ को चलाने के लिए मुख्य बातों का उल्लेख: श्री राम और विभषन संवाद।

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उम्मीद है आप सबको रामायण का ये अंश पढ़ना और समझना आसान होगा


   🙏🏼💐🚩जय जय सियाराम🚩💐🙏🏼












Shikha Bhardwaj

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2 Comments

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  1. धैर्य और संयम, शौर्य, पराक्रम तथा सत्य की पताका जिस रथ पर हो उसे कोई हरा नहीं सकता है।। शुभ प्रभात बहन जी नमस्कार।।जय श्री राम जी

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  2. जय श्री राम 🙏🙏🚩🚩

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