शारदीय नवरात्र 2022 का प्रथम दिन माँ शैलपुत्री की पूजा और उनकी महिमा, जन्म कथा
![]() |
शारदीय नवरात्र 2022 का प्रथम दिन माँ शैलपुत्री की पूजा और उनकी महिमा, जन्म कथाशारदीय नवरात्र 2022 |
शारदिय नवरात्रि आई,
खुशियाँ भरपूर लाई।
दादा-दादी बाँटे मिठाई,
माँ-पापा ने भी नए वस्त्र दिलाई।
घर मे अब तो धूम रहेगी,
पूरे दस दिन आरती और मंगल गान बजेगी।
चारों तरफ़ बस आनन्द की ही ख़ुशबू फैली,
माँ शेरोवाली हमारे आँगन जो डेरा डाली।
पूरे विश्व को बुद्धी देना माता,
हर घर में शुख समृद्धि का शंख बजाना।
रहे न कोई भूखा जग में,
आँखो में शांति की चमक तुम देना।
सब पर माता इतनी सी तुम बस कृपा करना।
शारदीय नवरात्र 2022, माँ शैलपुत्री :
शारदीय नवरात्र 2022 का आज पहला दिन माँ शैलपुत्री की आराधना और पूजा अर्चना का दिन है। आज (26/09/2022) से शारदीय नवरात्र 2022 का आरम्भ हो रहा है, आज प्रथम दिन माता शैलपुत्री की पूजा अर्चना होती है।
मै भी आगे आपको और कुछ बताऊँ , उससे पहले उनकी स्तुति कर लेते है।
माता शैल पुत्री की स्तुति :
वृषभ आरुढा माता जगतजननी
कहलाबे शैलपुत्री।
तुम्हरी कृपा पड़े हम भक्तों पर ,
हे माँ, हिमालय नंदिनी।
बांये कर कमल विराजे,
दाहिने हस्त त्रिशूलधारी,
माथे तेरे अर्द्ध चंद्र सजे हैं,
नाथ तेरे स्वयं त्रिपुरारी।
नवदुर्गा तू ही माता ,
तू ही सौम्य रूप धारिणी ,
कर दे कृपा हम भक्तों पर ,
हम बस निर्गुण प्राणी।
माता शैल पुत्री, पर्वत राज हिमालय की पुत्री है, जिस कारण से इनका नाम शैल पुत्री पड़ा।
माता स्वभाव से बड़ी ही सौम्य , शांत और प्रभावशाली है। दुर्गा जी के नवदुर्गा रूप में एक रूप ये
माता शैल पुत्री का भी है।
माता के माथे पर अर्ध चंद्र शुशोभित है तो, दाहिने हाथ में त्रिशूल शोभा पा रहे हैं और बाँए हाथ में में कमल।
माता शैल पुत्री नन्दी की सवारी करती हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता सती पर्वतराज हिमालय के घर पुनर्जन्म लेती हैं, तत्पश्चात उनका नाम हिमालय के नाम पर शैल पुत्री पड़ा। कथाओं के अनुसार मन जाता है कि , माता शैल पुत्री की पूजा अर्चन करने से मनुष्य चंद्र दोष से मुक्ति पा लेता है।
माँ शैल पुत्री के कुछ स्तुति और ध्यान मंत्र हैं, जिससे माँ स्वतः ही प्रसन्न हो जाती है। जिसे आप जरूर उच्चारण करे:--
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे ॐ शैलपुत्री देव्यै नम:।
मंत्र - ॐ शं शैलपुत्री देव्यै: नम:।
ध्यान मंत्र
वन्दे वांच्छित लाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम् ।
वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ॥
अर्थात- देवी वृषभ यानी नन्दी पर विराजित हैं। शैलपुत्री के दाहिने हाथ में त्रिशूल है और बाएं हाथ में कमल पुष्प सुशोभित है। यही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा है। नवरात्रि के प्रथम दिन देवी उपासना के अंतर्गत शैलपुत्री का पूजन करना चाहिए।
स्तोत्र पाठ
प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर: तारणीम्।
धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥
त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।
सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥
चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह: विनाशिन।
मुक्ति भुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रणमाम्यहम्॥
पौराणिक कथा के अनुसार पिछले जन्म में माता शैल पुत्री प्रजापति दक्ष की पुत्री सती थी। एक बार प्रजापति दक्ष ने, बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया। जिसमे उन्होंने सारे देवदाओं को अपने - अपने यज्ञ भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया, किन्तु सती के पति और तीनों लोको के स्वामी महादेव को आमंत्रित नहीं किया। माता सती ने जब यह सुना की उनके पिता एक विशाल यज्ञ का आयोजन कर रहे हैं, तब माता सती का भी मन, अपने मायके जाने के लिए उत्तेजित और विकल होने लगा। फिर उन्होंने अपनी ये ईक्षा शंकर जी को बताकर , जाने की अनुमति माँगने लगी।
शंकर जी को भी उस िशाल यज्ञ के बारे में ज्ञात था , लेकिन प्रजापति दक्ष के यहाँ से कोई निमंत्रण नहीं आने पर , उन्होंने माता सटी को समझाने की कोशिश करने लगे।
महादेव ने माता सती से कहा कि , शायद प्रजापति दक्ष हमसे किसी बात से रुष्ट हैं, शायद इसीलिए उन्होंने कैलाश पर निमंत्रण नहीं भेजा। अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है, लेकिन यहां उन्होंने एक सुचना तक नहीं भेजी। इसीलिए, इस स्थिति में तुम्हारा वहाँ जाना , किसी भी प्रकार से उचित नहीं है।
लेकिन माता सती को अपने मायके जाने का इतना अगन था कि , उनपर भगवान शंकर के समझाने का कोई असर नहीं हुआ। मायके जाकर यज्ञ देखने , माता और बहन से मिलने की व्याकुलता , भगवान शंकर के हर तर्क को अनसुना कर रही थी। इस तरह माता सती की प्रवल ईक्षा को देखते हुए , भगवन शंकर को समझ आ गया था कि सती मानने वाली नहीं है, तो फिर उन्होंने, उन्हें (माता सती ) को उनके मायके जाने की अनुमति आखिरकार दे ही दी।
इधर जब माता सती , अपने पिता के घर पहुंची तो वहाँ कोई भी उनसे सम्मानित भाव से नहीं मिल रहा था। केवल उनकी माता ही थी , जिन्होंने अपनी पुत्री को प्यार और सम्मान का भाव दिया था।
इस तरह माता सटी के मन को बहुत ठेस पहुंचा। इतना ही नहीं, जब उन्होंने देखा कि, उनके पति भगवान् शंकर के प्रति भी वही तिरस्कार का भाव है , तथा प्रजापति दक्ष ने भगवान शंकर के लिए कुछ अपशब्द भी कहे। ये सब माता सती के हृदयाघात , क्षोभ , ग्लानि और प्रचंड क्रोध का कारण बना।
माता सती को अब एहसास होने लगा था कि उन्होंने भगवान शंकर की बात न मानकर बहुत बड़ी भूल कर दी है। अपने पति के इस अपमान को सहना अब उनके लिए दुःसह हो चला था। तत्पश्चात अत्यंत क्रोध में आकर माता सती ने खुद को योगाग्नि द्वारा जलाकर भष्म कर दिया।
जब इस दारुण दुखद और असहनीय घटना को भगवान शंकर ने सुना तो तत्क्षण ही दक्ष के उस यज्ञ को पूर्णतः विध्वंस कर दिया और प्रजापति दक्ष का सर भी तन से अलग कर दिया। वो एक अलग पौराणिक कथा है जिसका विस्तार अगले ब्लॉग में।
इसी घटना चक्र के द्वारा , माता सती अगले जन्म में पर्वत राज हिमालय के घर जन्मी और तब हिमालय पुत्री होने के कारण वो शैल पुत्री के नाम से जानी जाने लगी। माता शैल पुत्री का दूसरा नाम पारवती और हेमवती भी है।
उपनिषद की कथा के अनुसार , इसी हेमवती स्वरुप से देवताओं का भी गर्व-भंजन किया था।
Note: इस तरह की जानकारियां कुछ क़िताबों से , गूगल पर बनाए गए पेज से एकत्रित है।मान्यताओं और हिन्दू संस्कृति के तर्ज पर, कुछ मैने अपनी अभिव्यक्ति को भी इस ब्लॉग में संजोया है।
#aparichita_अपरिचिता
#Shardiy_navratra_2022_ka_pratham_din_maa_shailputri-ki_puja_aur_unki_mahima_jnm_katha
Tags
abhivaykti
Aparichita
kavita
Navratri
Poetry
stuti
अपरिचिता
अभिव्यक्ति
कविता
नव रात्रि
हमारी संस्कृति

बहुत सुंदर व्याख्या
ReplyDelete🙏जय माता दी🙏