यूँ क्यूँ तुम ओष की तरह हुए परे हो.... हर पत्ते, हर पंखुरी पर बिखड़े परे हो

यूँ क्यूँ तुम ओष की तरह हुए परे हो....

हर पत्ते, हर पंखुरी पर बिखड़े परे हो

यूँ क्यूँ तुम ओष की तरह हुए परे हो....

हर पत्ते, हर पंखुरी पर बिखड़े परे हो



 यूँ क्यूँ तुम ओष की तरह हुए परे हो....

हर पत्ते, हर पंखुरी पर बिखड़े परे हो

क्यों नही सिमट एक हो जाते हो,

क्यूँ नही तुम बून्द-बून्द मिल दरिया बन जाते हो

कुछ तुझमे कुछ तेरी बातों में भी गहराई हो,

मिलूँ मैं तुझमे ही कहीं, कुछ जगह मेरी भी हो।

 

यूँ क्यूँ तुम ओष की तरह हुए परे हो....

हर पत्ते, हर पंखुरी पर बिखड़े परे हो


जरा सी तपिश जमाने की तुमको...

यूँ क्यूँ तुम्हे हवा कर जाती है....

कतरा - कतरा मिल बनो समँदर तुम,

फिर मिलों तुम कुछ यूं मुझसे....

मैं भी डूब जाऊँ यूँ तुझमे

चाह कर भी फ़िर कभी न पार पाऊँ तुझसे।


यूँ क्यूँ तुम ओष की तरह हुए परे हो....

हर पत्ते, हर पंखुरी पर बिखड़े परे हो


कुछ तो कहानी लिखो तुम अपनी भी

कुछ अल्फ़ाज़ मेरे भी सामिल करना

फिर किस्से बुने दुनियां.... 

कुछ अजब अपनी भी कहानी करना।

भीड़ भरी इस दुनियां में ......

कुछ अलग अपनी निशानी रखना।


यूँ क्यूँ तुम ओष की तरह हुए परे हो....

हर पत्ते, हर पंखुरी पर बिखड़े परे हो


#ओश #पंखुरी #अपरिचिता #काव्य 


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  ✍️Aparichita ❣️








Shikha Bhardwaj

Hi, I'm Shikha. I help English learners improve vocabulary, grammar, speaking confidence, and communication skills through practical lessons and real-life examples.

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