प्यार की सच्ची परिभाषा क्या है? ढाई अक्षरों का गहरा अर्थ

प्यार की सच्ची परिभाषा क्या है? ढाई अक्षरों का गहरा अर्थ

“प्यार – ढाई अक्षरों का शब्द, पर पूरी जिंदगी का अर्थ”



Introduction

कभी-कभी कुछ शब्द इतने छोटे होते हैं, लेकिन उनके अर्थ पूरे जीवन जितने विशाल होते हैं।
“प्यार” भी ऐसा ही एक शब्द है — केवल ढाई अक्षरों का, लेकिन इसकी गहराई को समझना आसान नहीं।
 कभी यह त्याग बनकर सामने आता है, कभी समर्पण बनकर, और कभी इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी भी बन जाता है।

समय के साथ समाज बदलता रहा, और शायद प्यार की परिभाषा भी बदलती चली गई।

लेकिन प्रश्न आज भी वही है — क्या आज का प्यार वास्तव में वही पवित्र भावना है, जिसकी मिसाल Radha और Krishna के प्रेम में मिलती है?

इन्हीं विचारों के साथ प्रस्तुत है प्रेम पर कुछ चिंतन।

"प्यार"

“प्यार” — इस शब्द में मानो पूरी दुनिया समाई हुई हो।
यदि किसी को यह मिल जाए तो वह जैसे पूरी दुनिया पा लेता है, और यदि न मिले तो जिंदगी तो किसी तरह कट ही जाती है। लेकिन ढाई अक्षर के इस “प्यार” को आज तक कोई भी पूर्णतः परिभाषित नहीं कर पाया है।

कभी इसे कवियों की कल्पनाओं ने परिभाषित किया है, तो कभी श्रीकृष्ण की लीलाओं ने।
कभी यह बादलों के घने झुंड जैसा लगता है, तो कभी किसी रूपवती के लहराते गेसुओं की सुनहरी जाल जैसा।
कभी यह मुरली की मधुर तान है, तो कभी राधा की खनकती हुई धुन।


यही प्रेम है जो राधा-कृष्ण को दूर होते हुए भी एक कर देता है।


यह या तो पूर्ण समर्पण है, या फिर सब कुछ पा लेने की ज़िद।

यह एक नशा भी है, जो कभी आपको फलक पर बिठा देता है, और कभी जब संभाल न पाओ तो गर्त में भी डाल देता है।

इस प्रेम के उदाहरण सती और शिव भी हैं।

शिव ने इसे संगीत में पिरोया, तो श्रीराम ने त्याग में इसे परिभाषित कर दिया।

यही प्रेम है जिसने कालिदास जैसे अज्ञानी को भी विद्वान बना दिया।

जब प्यार त्याग और समर्पण से किया जाता है, तो वह पारस बन जाता है।

और जब इसे केवल चाहत या स्वार्थ से किया जाए, तो विनाशक बनने में भी देर नहीं लगती।

इसी प्रेम ने छोटी-सी राजकुमारी मीरा को जोगन बना दिया था।

उसी प्रेम के विश्वास ने राणा के विष को भी अमृत बना दिया।

वहीं दूसरी ओर सत्यवती के पिता का पुत्री-प्रेम महाभारत की नींव बन गया।

प्यार केवल ढाई अक्षरों का है, लेकिन इसे विस्तार देना इंसान के वश में नहीं।

इस प्रेम ने कई महान साधुओं की तपस्या भी भंग कर दी और उन्हें पथ से भटका दिया।

लेकिन यहाँ एक प्रश्नचिह्न खड़ा होता है —

क्या आज भी प्यार की वही परिभाषा है?

क्या प्यार किसी की तस्वीर देखकर हो जाता है?

या किसी की आवाज़ सुनकर, या पहली मुलाकात में ही?

यदि ऐसा होता है, तो क्या वह एक दिन, एक महीने या एक साल के लिए ही होता है?

और फिर उतनी ही आसानी से दूसरा रास्ता या दूसरा चेहरा बदल लिया जाता है?

यदि हाँ, तो आखिर कितनी बार?

समाज ने अपने मॉडिफिकेशन करते-करते इस प्यार को भी बदल दिया है।

क्षणिक या कुछ दिनों की मस्ती सही है — यह सभी जानते हैं कि यह गलत है, लेकिन यदि मन को सुख दे रहा है तो सब सही मान लिया जाता है।

क्या कोई बता सकता है कि इसे बिगाड़ने में किसका हाथ है?

बॉलीवुड का, या खुद हमारा?

क्या खुद पर नियंत्रण न होना भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं है?

प्यार बहुत ही पवित्र शब्द है।

इसके साथ मजाक करना या युवाओं का इसके पीछे भटकना एक बीमार मानसिकता का परिचय है।

उन्हें यह समझना पड़ेगा कि क्षणिक सुख केवल बर्बादी दे सकता है, मंजिल नहीं।

जरूरी है कि प्यार की सही परिभाषा समझी जाए।

यह कुछ क्षणों, कुछ दिनों या कुछ सालों के लिए नहीं होता।

जिसे आप खेल समझकर किसी और के साथ करना चाहते हैं, क्यों न उसे अपनी जीवन-संगिनी के लिए बचाकर रखें?

यह ईमानदारी तो आपको रखनी ही चाहिए।

जीवन में कई ऐसे काम और खुशियों के पल होते हैं, जिन्हें हम पहली बार अनुभव करते हैं — और उसी में उनका विशेष आनंद होता है।

फिर क्यों किसी के पीछे उस अनमोल पल को नष्ट किया जाए?

यही तो वह सौगात होती है जो आप अपनी अर्धांगिनी के लिए लेकर आते हैं।

जब मनोरंजन के लिए आप किसी से दोस्ती करते हैं, तो जाहिर है कि उनसे वही सारी बातें करेंगे जो आप अपनी जीवन-संगिनी के साथ करना चाहेंगे।

तो फिर उनके लिए नया आपने क्या बचाया?

जो पूरी जिंदगी आप पर न्योछावर करने आने वाली है।

अविश्वास की शुरुआत तो यहीं से हो जाती है।


— शिखा भारद्वाज

“Aparichita – अनकहे भावों की एक छोटी सी दुनिया”



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