ये साल कुछ अलग है – A Tribute to Corona Warriors
ये साल कुछ अलग है,
पर उतनी भी बुरी नहीं, जितनी गुलामी की जंजीरों में बंधी रही।
सब कुछ अपना ही था,
पर रहमोकरम किसी और की बनी रही।
पन्ना धाय जैसी वफादार के देश में,
जयचंद की दग़ाबाज़ी बनी रही।
जान महारानी झाँसी की लेकर,
अताताइयों की चाटूकारिता बनी रही।
ये साल कुछ अलग है,
पर उतनी भी बुरी नहीं।
मिटाकर इतिहास राणा और शिवाजी का,
गुणगान अकबर की गाए रही।
भूल गए गुरु गोविंद के लाल को,
साम्प्रदायिकता के ढोंग सजाए रही।
भूल के बलिदान,
सुखदेव, भगतसिंह और राजगुरु जैसे वीरों का,
मानसरोवर पर झंडा चीन का लहराए रही।
आज भी कुछ ना बदला,
उरी और गलबन घाटी की साहसिक कारनामों पर भी
बेशर्मी से सवाल उठाए जा रही।
ये साल कुछ अलग है,
पर उतनी भी बुरी नहीं।
जिस देश में गाय को माँ की दर्जा मिली,
वही देश आज निर्ममता से
उसकी हत्या का मजा लेती रही।
बता के नाम काल्पनिक राम का,
बाबर के गुण गाए रही।
ये साल कुछ अलग है,
पर उतनी भी बुरी नहीं।
करके सलाम तिरंगा को,
कुछ तो नया प्रण करे हम,
जो याद रहे बलिदान वीर जवानों का।
जय वन्दे मातरम् 🙏
अंतिम विचार :
इस कविता के माध्यम से मैं समाज को जागृत करने की कोशिश कर रही हूँ।
कोरोना से निपटने में सरकार ने काम किया, लेकिन समाज, मोहल्ले और कुछ लोग देश की मिट्टी और अस्मिता को ठेस पहुँचा रहे हैं। उन्हें पहचानने और सुधारने की बहुत जरूरत है।
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