इंसान

आशा और अपनत्व के खोज में इंसान।
टूटता-बिखरता फिर उठता इंसान।
भीड़ में तन्हा और अपनों में अकेला इंसान।
न जाने जिंदगी भर क्या ढूँढता इंसान?

ख़ाली आए हैं और खाली ही जाएंगे,
सब जानता इंसान।
फिर भी अपना-पराया,ऊँच-नीच के
भेद-भाव मे जीता-ही जाता इंसान।
न जाने जिंदगी भर क्या ढूंढता इंसान।

तमन्नाओं के बाज़ार में,
सारे शुख-चैन खोता इंसान
लेकिन अपनी ही ज़िद्द पर अड़ा इंसान,
और  यूं ही कश-मो-कश में
जिंदगी बिता देता इंसान ।
न जाने जिंदगी भर क्या ढूँढता इंसान ।

बहुत हुआ अब तो रुको इंसान।
जिंदगी का सार तो समझो,
कि तुम हो हर जीवो में,
सर्वोच्च कहलाने वाले इंसान।
भागो,पर सोचों कि तुम
पीछे क्या छोड़े जा रहे इंसान ?
न जाने जिंदगी भर क्या ढूँढता इंसान।


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