मेरी वसुंधरा

🐾करोड़ों प्रजातियों से थी भरी, मेरी वसुंधरा।

 सैकड़ों नदि, जिसमे थी अमृत बहती, मेरी वसुंधरा।

गगन जिसके कदम चूमती वैसी मेरी वसुंधरा। 

हरे भरे पहाड़ और झड़नो का उपहार,मेरी वसुंधरा। 

औषधियों और रत्नो की सौगात मेरी वसुंधरा। 

सागर और हिमालय जिसकी शान ,वैसी मेरी वसुंधरा। 

क्या थी और क्या है आज मेरी वसुंधरा 😢?

तुझसे ही हैं हम भूल गए , किया तेरा ही संघार। 

पेड़ो का शोषण और पहाड़ो का दोहन ,

कितना सहेगी तू मेरी वसुंधरा। 

लाखो प्रजातियाँ जिससे थी प्रकृति संतुलन ,

वो विलुप्त हो अब बस  है, किताबो में

फिर भी क्या तू कर सकेगी माफ़ मेरी वसुंधरा?  

 महत्वकांछाओं की निर्माण ने किया संघार।

यातायात के धुँओं से बेहाल, मेरी वसुंधरा। 

दे विकाश का नाम किया विनाश, सिसकती मेरी वसुंधरा।

कारखाने बनी काल हवा और पानी के। 

प्लास्टिक और रसायनो का उपयोग 

थलचर और जलचर तो छोड़ो ,

 नभचर भी हुए बेहाल मेरी वसुंधरा।  

भोग- विलाश को दे आवस्यकता का नाम,

कहीं खनन ,कहीं दहन, कहीं अनावस्यक ही अविष्कार, 

दिया जन्म वैश्विक तापमान,जलवायु परिवर्तन 

और विष का उपहार।

 क्या अब भी जाग सकोगे इंसान ?

क्योंकि न तो हवा,न तो पानी की है बैंक बनी ,

जहाँ कर सकोगे अगली पीढ़ियों की भविष्य सुरक्षित। 

अमृत,औषधि और रत्नो से भरी ,मेरी वसुंधरा।  



  



 


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