मेरी धरा
अब बस रोती -बिलखती और सिसकती मेरी धरा।
जो थी निर्मल हवाओ का संचार ,
अब है दूषित धूंओं का अम्बार, मेरी धरा।
नदियां थी जिसकी धमनी ,जिसमे बहते अमृत।
पलते थे जलचर और सींचती थी हरियाली।
अब है रसायनो,प्लास्टिको का भंडार ,मेरी धरा।
सब किया बर्बाद दे विकाश का नाम।
अब बस हो गई है लाचार मेरी धरा।
जंगल काटे, पहाड़े काटी, किया जीवो
और प्रकृति का संघार।
जो थे एक दूसरे का सम्भार।
तनिक न सोचा करते रहे तुमसे व्यभिचार,मेरी धरा।
जहाँ देखो वहीं गंदगी और कूड़ो का अंबार।
उसपर खनन और खुदाई का अत्याचार।
देख ग्लेसियर का भी दिल पिघला ,
लिया बाढ़ का अवतार,मेरी धरा।
रुक जा, थम जा, रे मानुष! सब जीवो में प्रधान।
कि आ चुकी घड़ी चेतावनी की।
ये बाढ़,ये सुनामी ,ये भूकंप, ये महामारी।
कि गर नहीं रही धरा तो क्या बच पाओगे तुम?
अब बस रोती-बिलखती ,सिसकती मेरी धरा।