वक्त जैसे मुँह चिढ़ा रहा है।

ये वक्त और मजबूरियों की बारातें।

Ye vakt aur majbooriyon ki baraaten




 वक्त जैसे मुँह चिढ़ा रहा है,
पर किस बात पर ,
क्यूँ तू हमेसा मेरे ही पीछे पड़ा है।
अब तो बस एकांत की ही साथी बन बैठी हूँ।
कभी आ के तो मिल।
समझा  जरा,
ऐसी क्या नाफ़रमानी हुई मुझसे,
कि बस छिनता ही जा रहा है।
वक्त जैसे मुँह चिढ़ा रहा है।
गलतियों की सजा होती है,
पर तु तो बर्बाद किए जा रहा है।
दे सिला, मगर हिसाब से।
मुझे मिटा ,क्या तू चैन पा लेगा ?
न होऊँगी मैं,
 तो क्या तू तन्हा न हो जाएगा ?
तुझे भी चाहिए खिलौने - खेलने को,
तो खेल, मगर  बचाकर।
टूटे खिलौने तो बस भंगार है।
भंगारो से मजा ,क्या तु पा लेगा ?
वक्त जैसे मुँह चिढ़ा रहा है।
उदासी दिखा नही सकती,
रोना तो क्या मुस्कुरा नही सकती।
कौन सा कर्म है जिसकी सिला मिटती नही,
तू खेले जा रहा,
 और मौत से भी मेरी बनती नही।
कर दया,
और दे दो गज सादे वस्त्रों का आलिंगन।
कि बस अब थकती जा रही हूँ।


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