जितनी शिद्दत से तू चाय बनाता था।
जितनी शिद्दत से तू चाय बनाता था,
काश! आधी शिद्दत से मुझे समझा लेता।
कभी हाथों में लेकर हाथ
अच्छे बुरे की पहचान भी करवा देता।
जब आई थी पास तेरे ,
गीली मिट्टी ही तो थी!
मन के कोमल थाप से जरा मुझे सवार लेता।
पास बिठा कभी मेरे ढलते अश्रु ही चुम लेता।
तेरा ही हूँ मैं, ये दिलाशा दिला देता।
जितनी शिद्दत से तू चाय बनाता था....
माँ का रिस्ता भारी,प्रिय तेरी हलकी होती गई।
भैया-भावी, भाई-बहन सब अपने थे ।
मैं पराई थी, पराई ही रही।
जितनी शिद्दत से तू चाय बनाता था....
जिस रिस्ते की ख़ातिर, तूने मुझको छोरा,
देख सारे रिस्ते तूझको छोर गए,
और तू भी मुझको छोर गया।
जितनी शिद्दत से तू चाय बनाता था...
माना मैं गलत थी, पर तेरी थी,
तू मुझे बचा लेता।
अच्छे-बुरे का भेद जरा बता देता।
भर बाँहो में मुझे साँसे मेरी पढ़ लेता,
गलत-सही क्या जरा बता देता।
जितनी शिद्दत से तू चाय बनाता था..
मिल न सकूँ न सही,
चिट्ठी का पता बता देता।
तेरे सारे अपने झूठे हैं,
इसकी खबर लगा लेता।
जितनी शिद्दत से तू चाय बनाता था,
काश!आधी शिद्दत से मुझे समझा लेता।
